Tuesday, May 17, 2022
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती के अवसर पर जानते है उनके जीवन के बारे में, और उनसे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी साल 1897 में हुआ था। उन्होंने पहले भारतीय सशस्त्र बल की स्थापना की थी जिसका नाम आजाद हिंद फौज रखा गया था। उनके ‘तुम मुझे खून दो मैं, तुम्हें आजादी दूंगा’ के नारे से भारतीयों के दिलों में देशभक्ति की भावना और बलवान होती थी। आज भी उनके इस नारे से सभी को प्रेरणा मिलती है। नेताजी का जन्म ओडिशा में हुआ था और वो एक ब्रिलिएंट स्टूडेंट थे। स्कूल और यूनिवर्सिटी दोनों में हमेशा उनकी टॉप रैंक आती थी। 1918 में उन्होंने फिलॉस्फी में ग्रेजुएशन फर्स्ट क्लास में पूरी की। साल 1920 में उन्होंने सिविल सर्विस परीक्षा इंग्लैंड में पास की थी हालांकि कुछ दिनों बाद 23 अप्रैल 1921 में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को देखते हुए इस्तीफा भी दे दिया।साल 1920 और साल 1930 में वो इंडियन नेशनल कांग्रेस के युवा और कट्टरपंथी नेता बन गए। इसके बाद साल 1938 और 1939 में वो इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष भी बनें। 

उनका नाम सुभाष चंद्र बोस है, लेकिन बाद में इनको नेता जी के नाम के पहचाने जाने लगे। इन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी और सबसे बड़े नेता का भूमिका निभाया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए इन्होंने जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज का गठन किया। उनके द्वारा दिया गया जय हिंद का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। तुम मुझे खून दो मैं आजादी दूंगा यह नारा भी सुभाष चन्द्र बोस ने ही दिया था, जो कि उस समय प्रचलन में आया था, और यह आज भी बहुत प्रचलित है।

पौराणिक इतिहास कारों का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की थी। तो ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों को साल 1941 में खत्म करने का आदेश दिया था। नेताजी ने 5 जुलाई साल 1943 को सिंगापुर के टाउन हॉल के सामने सुप्रीम कमांडर के रूप में सेना को संबोधित करते हुए एक और नारा दिया यह नारा था “दिल्ली चलो” का नारा। और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा के साथ ही इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

साल 1948 के 21 अक्टूबर सुभाष आजाद सर्वर है कि अब से स्वतंत्र रूप से भारत की अस्थाई सरकार बनाई। जिसे जर्मनी, फिलीपींस, जापान, चीन, मन्चूको, इटली, कोरिया और आयरलैंड से मान्यता दी गई। जापान ने अंडमान निकोबार दीप इस अस्थाई सरकार को दे दिए। सुभाष चंद्र उन देशों में गए और उनका नया नामकरण किया। साल 1944 को आजाद हिंद फौज में अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशो को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध साल 1944 के 4 अप्रैल से 22 जून तक लाया गया था। इस भयावह एक बहुत भयंकर युद्ध था इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा जापानी सेना का पीछे हटना एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।

साल 1944 को 6 जुलाई के दिन रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम पर एक प्रसारण जारी किया गया। जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएं मांगी। नेताजी की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद देखने को मिलते हैं। जहां जापान में हर साल 16 अगस्त को उनका शहीद दिवस धूमधाम से मनाया जाता है। तो वहीं भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष चंद्र बोस की मौत साल 1945 में नहीं हुई। क्योंकि इसके बाद वे रूस में नजरबंद थे और अगर ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से संबंधित दस्तावेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किए।

साल 2014 से 16 जनवरी को कोलकाता हाईकोर्ट ने नेताजी के लापता होने का रहस्य से जुड़ी खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने के लिए स्पेशल बैंच के गठन करने का आदेश दिया। आजाद हिंद सरकार के 75 साल पूरा होने पर इतिहास में पहली बार साल 2018 में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 15 अगस्त के अलावा लाल किले पर तिरंगा फहराया और 11 देशो की सरकार ने इस सरकार को मान्यता दी थी।

नेताजी सुभाष चंद्र का जन्म साल 1897 के 23 जनवरी के दिन उड़ीसा के कटक शहर में एक हिंदू कायस्था परिवार में हुआ था। के पिता का नाम था जानकीनाथ बोस और मां का नाम था प्रभावती। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। पहले वह सरकारी वकील थे और बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी। उन्होंने कटक के महापालिका में एक लम्बे समय तक काम किया था। और वह बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे सरकार ने उन्हें रायबहादुर का खिताब दिया था।

प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगा नारायण दत्त था। डॉक्टर परिवार को कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थे जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे, सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पांचवें बेटे थे। अपने भाई बहनों से सुभाष चंद्र बोस को बहुत ज्यादा लगाव था और ज्यादा लगाव शरद चन्द्र से था। शरद बाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थे सुभाष चंद्र उन्हें मेजदा कहते थे।

सुभाष चंद्र बोस की शिक्षा

कटक के प्रोटेस्टेंन्ट स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूरा करके साल 1909 में उन्होंने रेवेनशा कॉलेजिएट स्कूल में दाखिला लिया। सुभाष के मन पर उनके कॉलेज के प्रिंसिपल बेनीमाधव दास के व्यक्तित्व का बहुत प्रभाव पड़ा।

केवल 15 साल की उम्र में ही सुभाष ने विवेकानंद के साहित्य का पूर्ण अध्ययन किया था। साल 1915 में उन्होंने बीमार होने के बावजूद भी इंटरमीडिएट की परीक्षा में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। साल 1916 में जब वे दर्शनशास्त्र(ऑनर्स) में बीए BA के छात्र थे, तब किसी बात पर प्रेसीडेंसी कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों के बीच झगड़ा हो गया। ऐसे में सुभाष चंद्र ने छात्रों का नेतृत्व संभाला जिस कारण उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज से 1 साल के लिए निकाल दिया गया था और परीक्षा देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।

49 वी बंगाल रेजीमेंट में भर्ती के लिए उन्होंने परीक्षा दी लेकिन उनकी आंखें खराब होने के कारण उन्हें सेना के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। बाद में उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में प्रवेश तो लिया लेकिन मन ही मन में वे सेना में ही जाने को कह रहे थे।

खाली समय का उपयोग करने के लिए उन्होंने टेरिटोरियल आर्मी की परीक्षा दी और फोर्ट विलियम से सेनालय में रँगरूट के रूप में प्रवेश पा गए। फिर ख्याल आया कि इंटरमीडिएट की तरह BA में भी उन्हें कहीं कम नंबर ना आए जाए, यह सोचकर सुभाष चंद्र ने उस समय खूब मन लगाकर पढ़ाई की और साल 1919 में उन्होंने बीए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनका दूसरा स्थान रहा था।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती के अवसर पर जानते है उनके जीवन के बारे में, और उनसे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में

सुभाष के पिता चाहते थे की वह ICS(आईसीएस) बने। लेकिन उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें एक ही बार में ही यह परीक्षा पास करनी थी। उन्होंने पिता से 24 घंटे का समय मांगा यह सोचने के लिए कि वे परीक्षा देंगे कि नहीं इस पर वह अंतिम निर्णय ले सके। वे पूरी रात इसी सामंजस्य में थे, कि वे परीक्षा दें की नहीं आख़िरी में उन्होंने परीक्षा देने का फैसला किया।

सुभाष चन्द्र साल 1919 के 15 दिसंबर के दिन इंग्लैंड चले गए। परीक्षा की तैयारी के लिए उनके किसी स्कूल में दाखिला न मिलने पर सुभाष चंद्र बोस ने किसी तरह किड्स विलियम हॉल में मानठीक और एवं नैतिक विज्ञान की ट्राई पास की। परीक्षा का अध्ययन करते हुए उन्हें प्रवेश मिल गया इससे उनके रहने व खाने की समस्या कल मैं हॉल में एडमिशन लेना तो बहाना था लेकिन का अर्थ का वास्तव में उनका मकसद था आईसीएस में पास हो कर दिखाना इसीलिए उन्होंने साल 1920 में वरीयता सूची में चौथा स्थान प्राप्त करते हुए।

इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने अपने बड़े भाई शरद चंद्र बोस को पत्र लिखकर उनकी राय जाननी चाहि कि उनके दिलो-दिमाग पर स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद घोष की आदर्शो ने छाप छोड़ रखे थे। ऐसे में आईसीएस(ICS) बनकर वह अंग्रेजों की गुलामी कैसे कर पाएंगे।

साल 1921 के 22 अप्रैल को भारत सचिव E.S मान्टेग्यू को आईसीएस से त्यागपत्र देने का पत्र लिखा। एक पत्र देशबंधु चित्तरंजन दास को लिखा लेकिन अपनी मां प्रभावती को यह पत्र मिलते ही उन्होंने कहा की “पिता,परिवार के लोग या अन्य कोई कुछ भी कहे उन्हें अपने बेटे के इस फैसले पर गर्व है”। सुभाष चंद्र साल 1921 के जून महीने में मानसिक और नैतिक विज्ञान ट्राईपास(ऑनर्स) की डिग्री के साथ स्वदेश वापस लौट आए।

कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्यक्रमों से प्रेरणा लेकर सुभाष चंद्र बोस दास बाबू के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने दास बाबू को खत लिखकर उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की। रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार भारत वापस आने पर वे सबसे पहले मुंबई गए और महात्मा गांधी से मिले। मुंबई के मणि भवन में गाँधीजी निवास करते थे। साल 1921 में 20 जुलाई के दिन गांधीजी और सुभाष चन्द्र के बीच पहली मुलाकात हुई। गांधी जी ने उन्हें कोलकाता जाकर दास बाबू के साथ काम करने की सलाह दी इसके बाद सुभाष कोलकाता आकर दास बाबू से मिले।

उन दिनों महात्मा गाँधी अंग्रेज सरकार के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे। दास बाबू इस आंदोलन का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ सुभाष भी इस आंदोलन में सहभागी हो गए। साल 1922 में दास बाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की।

विधानसभा के अंदर से अंग्रेज सरकार का विरोध करने के लिए स्वराज पार्टी ने कोलकाता महापालिका का चुनाव लड़कर जीत हासिल की और दास बापू कोलकाता के महापौर बन गए। उन्होंने सुभाष को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया। सुभाष चंद्र ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का संपूर्ण ढांचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला। कोलकाता में सभी रास्तों को अंग्रेजी नाम बदलकर उन्हें भारतीय नाम दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम में प्राण त्याग करने वालों के परिवारजनों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी।

और बहुत जल्दी सुभाष चंद्र भी देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए। जवाहरलाल लाल नेहरू के साथ सुभाष चंद्र ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडेंस लीग शुरू की।

साल 1927 में जब साइमन कमीशन भारत आया तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए। कोलकाता में सुभाष चंद्र बोस ने इसे आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए अंग्रेज ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष थे और शुभ आशीष के एक सदस्य थे।

इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की, साल 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कोलकाता में पेश हुआ। इस अधिवेशन में सुभाष ने गणवेश धारण करके मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी।उन दिनों गांधीजी पूर्ण स्वराज की मांग से सहमत नहीं थे। इस अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेज सरकार से डोमिनियन स्टेटस मांगने की ठान ली थी। लेकिन सुभाष बाबू और जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती के अवसर पर जानते है उनके जीवन के बारे में, और उनसे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में

आख़िरी में यह तय किया गया कि अंग्रेज सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए एक साल का वक्त दिया जाए। अगर एक साल में अंग्रेज सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की तो अंग्रेज़ पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। लेकिन अंग्रेज सरकार ने यह मांग पूरी नहीं कि। साल 1930 में जब जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता के दौरान लाहौर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ, तब ऐसा तय किया गया था कि 26 जनवरी के दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

साल 1931 के 26 जनवरी के दिन सुभाष चंद्र कोलकाता में राष्ट्र ध्वज फहराकर एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे तभी पुलिस ने उन पर लाठी चलाई और उन्हें घायल करके जेल भेज दिया। जब सुभाष चंद्र जेल में थे तब गांधी जी ने अंग्रेज सरकार के साथ समझौता किया और सब कैदियों को रिहा करवा दिया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों को रिहा करने से साफ इनकार कर दिया।

भगत सिंह की फांसी माफ कराने के लिए गांधीजी ने सरकार से बात की लेकिन नरमी के साथ। सुभाष चाहते थे कि इस विषय पर गांधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें। लेकिन गांधीजी अपनी ओर से दिए गए वचन तोड़ने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर ही अड़े रहे और भगत सिंह व उनके साथियों को फांसी दी दि गई। भगत सिंह को ना बचा पाने पर सुभाष गांधी और कांग्रेस के तरीके से बहुत नाराज हो गए।

अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष चंद्र को कुल 11 बार कारावास हुआ था। सबसे पहले उन्हें साल 1921 में 16 जुलाई के दिन 6 महीने के लिए कारावास हुआ था। साल 1925 में गोपी नाथ साहा नाम के एक क्रांतिकारी कोलकाता के पुलिस अधीक्षक चार्लस टेगार्ट को मारना चाहता था।

उसने गलती से ओरनेस्ट डे नामक एक व्यापारी को मार डाला इसके लिए उसे फांसी की सजा दी गई। गोपीनाथ को फांसी होने के बाद सुभाष फूट-फूट कर रोए, उन्होंने गोपीनाथ का शव मांग कर उसका अंतिम संस्कार किया। इससे अंग्रेज सरकार ने यह निष्कर्ष निकाला कि सुभाष ज्वलन्त क्रांतिकारियों से ना केवल संबंध रखते हैं, बल्कि वे उन्हें उत्प्रेरित भी करते हैं। और इसी बहाने से अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया बिना कोई मुकदमा चलाए ही अनिश्चित काल के लिए म्यांमार के माण्डले कारागृह में बन्दी बनाकर भेज दिया।

साल 1925 के 5 नवंबर को देशबंधु चित्तरंजन दास कोलकाता में जाकर बस गए। सुभाष चंद्र ने उनकी मृत्यु की खबर मांडले कारागृह में रेडियो पर सुनी। माण्डले कारागृह में रहते समय सुभाष की तबीयत बहुत खराब हो गई थी।उन्हें तपेदिक हो गया लेकिन अंग्रेज सरकार ने फिर भी उन्हें रिहा करने से इनकार कर दिया। सरकार ने उन्हें रिहा करने के लिए यह शर्त रखी कि वह इलाज के लिए यूरोप चले जाए लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि इलाज के बाद वे भारत कब लौट सकते हैं। इसीलिए सुभाष चंद्र ने यह शर्त स्वीकार नहीं किया आखिरी में परिस्थिति इतनी कठिन हो गई कि जेल अधिकारियों को यह लगने लगा कि कहीं वे कारावास में ही ना मर जाए। अंग्रेज सरकार यह खतरा भी नहीं उठाना चाहते थे कि सुभाष की कारागृह में ही मृत्यु हो जाए, इसीलिए सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। उसके बाद सुभाष इलाज के लिए डलहौजी चले गए।

साल 1930 में सुभाष चंद्र बोस कारावास में ही थे जब चुनाव में उन्हें कोलकाता का महापौर चुना गया। इसीलिए सरकार उन्हें रिहा करने पर मजबूर हो गई। साल 1932 में सुभाष चंद्र को फिर से कारावास हुआ, इस बार उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया। अल्मोड़ा जेल में रहते समय उनकी तबीयत फिर से खराब हो गई। चिकित्सकों की सलाह पर सुभाष चंद्र इस बार इलाज के लिए यूरोप जाने के लिए राजी हो गए।

साल 1934 में सुभाष चंद्र बोस अपना इलाज कराने ऑस्ट्रिया में ठहरे थे। अपनी पुस्तक लिखने के लिए उन्हें अंग्रेजी जानने वाले एक टाइपिस्ट की आवश्यकता हुई। उनके मित्र ने एमिली शेंकल(Emilie Schenkl) नाम की एक ऑस्ट्रियन महिला से उनकी मुलाकात कराई। एमिली के पिता एक पशु चिकित्सक थे। सुभाष एमिली की ओर आकर्षित हुए और उन दोनों में प्रेम हो गया।

साल 1942 में नाजी जर्मनी के सख्त कानून को देखते हुए बाड गस्टिन नामक स्थान पर उन दोनों ने हिंदू पद्धति से शादी कर लिया। फिर जाकर वियना में एमिली ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम उन्होंने अनिता बोस रखा। अगस्त, साल 1945 में ताइवान में हुए तथाकथित विमान दुर्घटना में जब सुभाष चंद्र की मौत हुई तब अनीता केवल पौने 3 साल की थी। अनीता अभी भी जीवित है और कभी कभी भी अपने परिवार वालों से मिलने के लिए भारत भी आती है।

सुभाष चंद्र बोस से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य —

  • साल 1921 से 1941 के दौरान वो पूर्ण स्वराज के लिए कई बार जेल भी गए थे। उनका मानना था कि अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता नहीं पाई जा सकती। 
  • दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने सोवियत संघ, नाजी जर्मनी, जापान जैसे देशों की यात्रा की और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सहयोग मांगा। 
  • इसके बाद सुभाष चंद्र बोस जापान में उन्होंने आजाद हिंद फौज की स्थापना की।
  • जय हिंद का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। 
  • सुभाष चंद्र बोस ने  “तुम मुझे खून दो मैं आजादी दूंगा” यह नारा दिया था।  
  • सुभाष चंद्र बोस ने  “जय हिंद” का नारा दिया था।   
  • सुभाष चंद्र बोस को सरकार ने रायबहादुर का खिताब दिया था।  
Jhuma Ray
Jhuma Ray
नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।
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