“चेंजिंग इंडिया” आइए जानते हैं इस पुस्तक और डॉ मनमोहन सिंह के बारे में।

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“चेंजिंग इंडिया” आइए जानते हैं इस पुस्तक और डॉ मनमोहन सिंह के बारे में।
“चेंजिंग इंडिया” आइए जानते हैं इस पुस्तक और डॉ मनमोहन सिंह के बारे में।

चेंजिंग इंडिया पुस्तक पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह द्वारा लिखी गई है। इस पुस्तक को साल 2018 में 18 दिसंबर के दिन दिल्ली में विमोचन किया गया था यह पुस्तक भारत के आर्थिक और राजनीति प्रकाश डालती है। इस पुस्तक के विमोचन समारोह में डॉ मनमोहन सिंह ने कहा कि मेरे प्रधानमंत्री रहने के दौरान भारत में हुए कामों और भारत की प्रगति के बारे में इस पुस्तक में विस्तार से बताया गया है जिसके बारे में सरकार बात नहीं करती है।

इस दौरान डॉ मनमोहन सिंह ने कहा कि अपने कार्यकाल के दौरान वह बतौर प्रधानमंत्री प्रेस से बात करते थे और उन्हें नीतियों से अवगत भी कराते थे। मनमोहन सिंह ने यह भी कहा कि भारत में दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ताकत है।

चेंजिंग इंडिया पांच खंडों में प्रकाशित है इस किताब में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने अपने 10 साल के कार्यकाल के दौरान किए गए कामों और एक अर्थशास्त्री के रूप में भारत की अर्थव्यवस्था का आकलन किया है। इस किताब के विमोचन के दौरान डॉ मनमोहन सिंह ने कहा कि लोग कहते हैं कि मैं एक खामोश प्रधानमंत्री था। लेकिन मेरी किताब के पांचों भाग में सारी बातें लिखी हुई है मेरी यह किताब इस बात को बेहतर तरीके से बताएंगी।

चेंजिंग इंडिया किताब में डॉक्टर मनमोहन सिंह के जीवन पर भी प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक में उनके बचपन, शिक्षा, अर्थशास्त्री के रूप में जीवन तथा बतौर प्रधानमंत्री रहने के समय उनके जीवन के सफर को दर्शाया गया है।

चेंजिंग इंडिया पुस्तक के माध्यम से डॉ मनमोहन सिंह ने भारत के आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर विस्तार से लिखा है। चेंजिंग इंडिया के पहले भाग का शीर्षक है भारत के निर्यात रुझान और आत्मनिर्भर विकास के लिए कुछ संभावनाएं।

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के भाग्य में वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक बड़ा पावर हाउस बनाना लिखा है। सभी बाधाओं और व्यवस्थाओं के बाद भी भारत हमेशा सही दिशा में बढ़ता रहेगा। और भविष्य में वैश्विक अर्थव्यवस्था का पावर हाउस बनेगा।

चेंजिंग इंडिया पुस्तक के लेखक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 

कांग्रेस के नेता व भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह देश के 14 में प्रधानमंत्री रहे हैं। वे विचारक और विज्ञान के रूप में भी प्रसिद्ध है वह अपने नम्रता के लिए जाने जाते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्म साल 1932 के 26 जनवरी को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के एक गांव में हुआ था।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने अपनी मैट्रिक की शिक्षा साल 1948 में पूरी की। उसके बाद उन्होंने अपनी आगे की शिक्षा ब्रिटेन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय से ब्रिटिश के विश्वविद्यालय से पूरी की। उन्होंने साल 1957 में स्नातक डिग्री प्राप्त की इसके बाद साल 1962 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के नफिल्ड कॉलेज से अर्थशास्त्र में डी.फिल किया।

डॉ मनमोहन सिंह ने अपनी पुस्तक “भारत में निर्यात और आत्मनिर्भरता और विकास की संभावनाएं” इस पुस्तक में भारत में निर्यात आधारित व्यापार नीति की आलोचना की। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में शिक्षक के रूप में कार्य किया था, जो उनके अकादेमिक श्रेष्ठता को दिखाता है। चोरों ने कुछ सालों के लिए यूएनसीटीएडी सचिवालय के लिए भी कार्य किया था। इसी के आधार पर उन्हें साल 1987 और साल 1990 में जिनेवा में दक्षिण आयोग के महासचिव के रूप में नियुक्त किया गया।

“चेंजिंग इंडिया”  कांग्रेस दल के नेता  व देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लिखी गई पुस्तक है, आइए जानते हैं इस पुस्तक और डॉ मनमोहन सिंह के बारे में।
“चेंजिंग इंडिया” आइए जानते हैं इस पुस्तक और डॉ मनमोहन सिंह के बारे में।

साल 1971 में डॉ मनमोहन सिंह वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में भी शामिल हुए। फिर जाकर साल 1972 में उनकी नियुक्ति वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में हुई। डॉ मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्रालय के सचिव योजना आयोग के उपाध्यक्ष, भारतीय रिजर्व बैंक के अध्यक्ष, प्रधानमंत्री के सलाहकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष के रूप में काम किया है।

डॉ मनमोहन सिंह ने साल 1991 से साल 1996 तक भारत के वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। जो स्वतंत्र भारत के आर्थिक इतिहास में एक निर्णायक समय था। आर्थिक सुधारों के लिए उनके व्यापक नीति के निर्धारण के भूमिका को सभी ने सराहा है, लोकसभा चुनाव में मिली जीत के बाद जवाहरलाल नेहरू के बाद डॉक्टर मनमोहन सिंह भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने, जिनको 5 वर्षों के सफलतापूर्वक कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला था।

डॉ मनमोहन सिंह को कई पुरस्कार और सम्मान से सम्मानित किया गया है। साल 1987 में उनको भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। साल 1995 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस का जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साल 1993-94 के दौरान उन्हें वर्ष के वित्त मंत्री के लिए एशिया मनी अवार्ड से सम्मानित किया गया था।

साल 1993 में ही वर्ष के वित्त मंत्री के लिए यूरो मनी अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके बाद साल 1956 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय के एडम स्मिथ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। साल 1955 में कैंब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज में अपने विशिष्ट प्रदर्शन के लिए डॉक्टर सिंह को राइट पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। यही नहीं डॉक्टर सिंह को जापानी निहोन कीजई शिम्बुन और अन्य संघों द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है। साथ ही डॉक्टर सिंह को कैंब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड के साथ कई विश्वविद्यालयों द्वारा मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया है।

साल 1985 में राजीव गांधी के शासन काल में डॉ मनमोहन सिंह को भारतीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने इस पद पर निरंतर 5 वर्षों तक कार्य किया और साल 1990 में यह प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार बनाए गए।

साल 1991 में पी वी नरसिंह राव ने अपने मंत्रिमंडल में डॉ मनमोहन सिंह को सम्मिलित करते हुए वित्त मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभाव सौंप दिया। इस समय डॉ मनमोहन सिंह ना तो लोकसभा और ना ही राज्यसभा के सदस्य थे। लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार देखा जाए तो सरकार के मंत्री को संसद का सदस्य होना आवश्यक होता है। और इसीलिए उन्हें साल 1991 में असम के राज्यसभा के लिए चुना गया।

डॉ मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण को उपचार के रूप में प्रस्तुत किया और भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार के साथ जोड़ दिया। डॉ मनमोहन सिंह ने आयात और निर्यात को भी सहज बनाया। लाइसेंस और परमिट गुजरे जमाने की चीजें हो गई। जब नई अर्थव्यवस्था घुटनों पर चल रही थी तब पीवी नरसिम्हा राव को कटु आलोचना से गुजारना पड़ा। विपक्ष उन्हें नए आर्थिक प्रयोग से सावधान करा रहे थे लेकिन पी.वी राव को मनमोहन सिंह पर पूरा यकीन था और केवल 2 साल बाद ही आलोचना करने वालों के मुंह बंद हो गए। क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के बेहतर परिणाम नजर आने लगे। इस तरह एक गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति जो अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे उनका भारतीय राजनीति में प्रवेश हुआ ताकि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके।

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