Tuesday, May 17, 2022
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तीन तलाक : जिससे कोई भी मुस्लिम अपनी बीवी को तलाक दे सकता है। क्या ऐसा तलाक सही है ?

तीन तलाक मुस्लिम समाज में तलाक देने का एक जरिया है, जिससे कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपने बीवी को तलाक दे सकता है। और वह भी केवल तीन बार तलाक कहकर। इस्लाम में तलाक की इस प्रक्रिया से होने वाले तलाक स्थिर होते हैं जिसके बाद पति पत्नी में शादी का रिश्ता टूट जाता है। तीन तलाक को तलाक ए भी भी कहा जाता है। जिसमें तीन बार तलाक कहकर कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी शादी को तोड़ सकता है।

तलाक़ ए बिदअत क्या है

तीन बार तलाक को तलाक़ ए बिदअत कहा जाता है। यानी बिदअत का मतलब वह कार्य या प्रक्रिया है जिसे इस्लाम का मूल अंग समझकर सदियों से अपनाया जा रहा है।

हालांकि हदीस और कुरान की रोशनी में यह कार्य प्रणाली साबित नहीं होती। जब कुरान और हदीस से कोई बात साबित नहीं होती फिर भी इसे इस्लाम समझ कर अपनाना बिदअत यानि ट्रिपल तलाक है।

इस्लाम धर्म में कैसे होता है तीन तलाक

इस्लाम धर्म में तलाक देने का एक तरीका बताया गया है। जिसके तहत एक बार में पति एक ही तलाक दे सकता है। अगर कोई एक बार में एक से ज्यादा बार भी तलाक बोल दे तो उससे तलाक नहीं होगा। दरअसल इस्लाम में बताया गया है कि तलाक एक एक करके बोली जानी चाहिए। जिसके बीज कुछ समय का अंतर होगा और इस प्रक्रिया को अपनाकर इस्लाम के अनुसार तलाक हो सकता है। तलाक ए बिदअत यानी तीन तलाक के तरह जब एक व्यक्ति अपनी पत्नी को एक बार में ही तीन तलाक बोल देता है या फोन पत्र, ईमेल जैसे आधुनिक साधनों के उपयोग के जरिए तीन तलाक देता है तो इसके बाद तुरंत तलाक हो जाता है और इसे निरस्त नहीं किया जा सकता। ट्रिपल तलाक जीसे तलाक ए बिदअत, तत्काल तलाक के रूप में भी जाना जाता है। इसे इस्लामी तलाक का एक रूप है जिसे भारत देश में मुसलमानों द्वारा इस्तेमाल किया गया है। 

 तीन तलाक़ यानि ट्रिपल तलाक़ पर कई देशों के प्रतिबंध 

दुनिया के ऐसे कई देश है जहां तीन तलाक के प्रक्रिया को पूरी तरह बैन कर दीया है।

सबसे पहले मिस्र में तीन तलाक को बैन किया गया था। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी तीन तलाक को साल1956 से ही बैन किया गया है। इसी तरह मोरक्को, ब्रूनेई, अल्जीरिया, ईरान, सूडान, साइप्रस, कतर, जार्डन और यूएई में भी तीन तलाक बैन है।

यहां तक कि भारत के पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश पाकिस्तान में भी तीन तलाक के प्रथा पर रोक लगा दी गई है।

तीन तलाक़ पर क्या कहता है कुरान

आधुनिक युग में शिक्षा से प्रभावित व्यक्तियों का दावा है कि कुरान में तलाक को अनैतिक कहा गया है। इस्लाम के पवित्र कुरान में तलाक ना करना ही सही कहा गया है। यही वजह है कि इसको खूब कठिन बताया गया है तलाक देने के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया भी बताई गई है। उस प्रक्रिया अनुसार परिवार के सभी लोगों के बीच बातचीत, पति-पत्नी के बीच संवाद करके सुल्हे करने पर जोर देना चाहिए। मुस्लिम धर्म के पवित्र कुरान में कहा गया है कि जहां तक संभव हो सके तलाक ना दिया जाना चाहिए और अगर तलाक देना जरूरी हो अनिवार्य हो तो यह काम कम से कम सही प्रक्रिया और न्याय प्रक्रिया से होनी चाहिए। कुरान में दोनों पक्षों के बीच बिना बातचीत हुए और तलाक के वजह को साझा किए बगैर तलाक का जिक्र नहीं किया गया है।

तीन तलाक : जिससे कोई भी मुस्लिम अपनी बीवी को तलाक दे सकता है। क्या ऐसा तलाक सही है ?

इस्लाम के पवित्र कुरान में पवित्र मियां बीवी के रिश्ते में तलाक करने की समय अवधि स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है। एक ही समय में तालाक का सवाल ही नहीं उठता। इस्लाम कभी भी खत लिखकर, टेलीफोन, ईमेल इत्यादि जैसे आधुनिक साधन के उपयोग के माध्यम से एकतरफा और अनौपचारिक रूप से लिखित तलाक की इजाजत नहीं देता है। एक समय में ही व एक बैठक में ही पति पत्नी को दिया गया तलाक इस्लाम धर्म में अनौपचारिक बताया गया है। इसीलिए ऐसा किया जाना दूसरे देशों में अवैध बताया जाता है।

तलाक ए बिदअत यानी तीन तलाक के तरह जब एक व्यक्ति अपनी पत्नी को एक बार में ही तीन तलाक बोल देता है या फोन पत्र, ईमेल जैसे आधुनिक साधनों के उपयोग के जरिए तीन तलाक देता है तो इसके बाद तुरंत तलाक हो जाता है और इसे निरस्त नहीं किया जा सकता। ट्रिपल तलाक जीसे तलाक ए बिदअत, तत्काल तलाक के रूप में भी जाना जाता है। इसे इस्लामी तलाक का एक रूप है जिसे भारत देश में मुसलमानों द्वारा इस्तेमाल किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला 

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक की प्रथा पर रोक लगा दी थी। उत्तराखंड की शायरा बानो की याचिका पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था। पांच जजों की पीठ ने ऐसे तलाक देने के इस रिवाज को असंवैधानिक करार देते हुए कहा था कि तीन तलाक़ इस्लाम की शिक्षा के विरुद्ध है। शायरा को उनके पति ने तीन बार तलाक लिख कर भेजा था, जिसके बाद उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया। इसके बाद शायरा ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। तब शायरा  की याचिका के साथ और 4 मुस्लिम महिलाओं महिलाओं के याचिका भी इस याचिका के साथ जोड़ दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त साल 2017 में तीन तलाक प्रथा को गैरकानूनी करार देते हुए तीन बार तीन तलाक़ विधेयक को लोकसभा में पारित किया गया। लेकिन यह विधेयक दो बार राज्यसभा में अटक गया, फिर केंद्र सरकार ने तीसरी बार इस विधेयक को राज्यसभा में पेश किया जहां इसे पास करने में कामयाबी मिली।

अलग-अलग धर्म के पांच जजों ने फैसला सुनाते हुए सरकार से तीन तलाक पर 6 महीने के अंदर कानून लाने को कहा था। दो जजों ने इसे असंवैधानिक कहा, एक जज ने इसे पाप बताया जबकि दो जजों ने इस पर संसद को कानून बनाने को कहा।

लोकसभा से संसद में यह बिल तीन बार पास हुआ, लेकिन राज्यसभा में जाकर अटक गया। इसके बाद इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए सरकार ने अध्यादेश का रास्ता अपनाया। हालांकि 6 महीने के अंदर इस पर संसद की मुहर लगनी जरूरी थी।

तीन तलाक पर सरकार ने जारी की अध्यादेश

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद इसका इस्तेमाल होने पर सरकार ने साल 2018 के सितंबर महीने में अध्यादेश लागू की। इसके अनुसार तीन तलाक देने वाले पति को 3 साल की सजा का प्रावधान रखा गया। इस अध्यादेश की अवधि साल 2019 के जनवरी महीने में पूरी होने की थी लेकिन अवधि से पहले ही साल 2018 के दिसंबर महीने में सरकार एक बार फिर से इस बिल को लोकसभा में नए सिरे से पेश करने पहुंची।

साल 2018 के 17 दिसंबर को लोकसभा में बिल पेश किया गया। हालांकि एक बार फिर से विपक्ष ने राज्यसभा में इसे पेश नहीं होने दिया और बिल को सिलेक्ट कमेटी में भेजने की मांग की जाने लगी और एक बार फिर यह बिल अटक गया।

तीन तलाक विधेयक के प्रावधान

तीन तलाक को एक संघीय अपराध मानने का प्रावधान है। यानी पुलिस बिना किसी वारंट के तीन तलाक देने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है लेकिन जब महिला खुद शिकायत करें।

  • पड़ोसी या कोई अनजान शख्स इस मामले में केस दर्ज नहीं कर सकता।
  • तीन तलाक यानि एक बार एक में देना गैरकानूनी है।   
  • आरोपी यानि तीन तलाक देने वाले पति को 3 साल तक की सजा का प्रावधान।
  • मजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत दिला सकता है।
  • आरोपी को जमानत तभी दी जाएगी जब पीड़ित महिला का पक्ष सुना जाएगा।
  • पीड़ित महिला के अनुरोध पर मजिस्ट्रेट समझौता करने की अनुमति दे सकता।
  • शादी के रिश्ते या खून के रिश्ते वाले सदस्यों के पास भी केस दर्ज करने का अधिकार होगा।
  • पीड़ित महिला पति से गुजारा भत्ते का दावा कर सकती है।
  • पीड़ित महिला को पति कितना रकम देगा यह जज तय करेगा।
  • पीड़ित महिला के नाबालिक बच्चे किसके पास रहेंगे, इसका फैसला भी मजिस्ट्रेट करेगा।

लिखित, मौखिक, इलेक्ट्रॉनिक तरीका जैसे मोबाइल, फोन (SMS, WhatsAap, E-Mail) इत्यादि साधनों के जरिए दिए गए तालाक को अमान्य करार दिया गया है।

Jhuma Ray
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नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।
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