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मकर सक्रांति 2020: जानिए मकर सक्रांति क्या है, यह त्यौहार किन-किन जगहों पर कैसे मनाया जाता है।

हर साल मकर सक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है। और हर साल की तरह इस साल भी 14 जनवरी गुरुवार के दिन मकर सक्रांति मनाया जाएगा। जब पूरे भारतवर्ष में लोग अपने अपने तरीके से इस त्यौहार को मनाएंगे। आइए जानते हैं किन किन जगहों में लोग कैसे मकर सक्रांति का त्यौहार मनाते हैं और इस त्यौहार का क्या महत्व है। इसके अलावा हम जानेंगे कि मकर सक्रांति आखिर क्यों मनाया जाता है।

मकर सक्रांति का महत्त्व

कहा जाता है कि इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि देव से नाराजगी भूलाकर उनके घर जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने का, दान पूण करने का, पूजा पाठ करने का बहुत महत्व होता है। ऐसा करने से व्यक्ति का पुण्य बढ़ जाता है इस दिन को मलमास यानी खरमास भी ख़त्म हो जाता है और एक शुभ महीने की शुरुआत होती है। मकर सक्रांति के दिन को सुख-समृद्धि भरपूर दिन माना जाता है।

मकर सक्रांति एक भारतीय धार्मिक परंपरा है, जो भारतीय संस्कृति में बहुत विशेष महत्व रखता है। शास्त्रों के अनुसार मकर सक्रांति सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए इस दिन दान-दक्षिणा देने का स्नान करने का बहुत महत्व बताया गया है। पारंपरिक तौर पर मकर सक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है। मकर संक्रांति का “मकर” शब्द मकर राशि को इंगित करता है और सक्रांति का मतलब होता है संक्रमण अर्थात प्रवेश करना। मकर सक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। और एक राशि को छोड़कर दूसरे राशि में प्रवेश करने की प्रक्रिया को ही मकर सक्रांति कहा जाता हैं।

मकर सक्रांति के दिन सूर्य देव दक्षिणायन से घूम कर अपनी दिशा बदल कर उत्तरायण हो जाते हैं। यानी कि सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ने लगते हैं जिससे दिन की लंबाई बढ़ने लगती है और रात की लंबाई छोटी होनी शुरू हो जाती है। भारत में मकर सक्रांति के दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत भी मानी जाती है। इसीलिए भारत में मकर सक्रांति को “उत्तरायण” के नाम से भी जाना जाता है।

मकर सक्रांति के विभिन नाम 

तमिलनाडु के लोग मकर सक्रांति को पोंगल कहते हैं और कर्नाटक, केरल,आंध्रप्रदेश के जगहों में मकर सक्रांति को केवल संक्रांति कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर में मकर सक्रांति को लोहरी के नाम से मनाया जाता है। जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है। इस दिन कहीं कहीं लोग खिचड़ी बना कर खाते हैं और दान भी करते हैं तो वहीं कुछ जगहों पर दही चुरा खाने का भी रिवाज है। पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति के अवसर पर गंगासागर स्थान पर बहुत विशाल मेला का आयोजन होता है, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु ईकट्ठे होते हैं। पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति के पर्व को तीन दिन करने की परंपरा है।  

यानि मकर सक्रांति अलग अलग जगह अनुसार विभिन्न नाम से प्रचलित हैं और विभिन्नजगहों पर अलग अलग तरह से इस पर्व को मनाते हैं। लेकिन इसका महत्व कभी अलग नहीं हो सकता, इसका महत्व हर जगह समान है। हालांकि लोग इस पर्व को अलग अलग नाम से जानते हैं और जगह के अनुसार अलग तरह से मनाते हैं।

भारत के बाहर भी मकर सक्रांति का त्यौहार मनाया जाता हैं जिसके अलग-अलग नाम है।

बांग्लादेश में मकर सक्रांति को पौष सक्रांति के रूप में मनाते हैं। नेपाल में माघे सक्रांति, माघी सक्रांति या खिचड़ी सक्रांति के रूप में मनाते हैं। थाईलैंड में मकर सक्रांति सोंगकरन कहते है, तो म्यांमार में थियांग कहते हैं। कंबोडिया में मकर सक्रांति को मोहा संगक्रान कहते हैं तो वहीं लाओस में इसे पि मा लाओ कहते हैं। और श्रीलंका में पोंगल, उझवर तिरुनल कहते हैं।

मकर सक्रांति क्यों मनाई जाती है

मकर सक्रांति 2020: जानिए मकर सक्रांति क्या है, यह त्यौहार किन-किन जगहों पर कैसे मनाया जाता है।

मकर सक्रांति इसीलिए मनाई जाती है क्योंकि सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते है। यानी कि सूर्य देव का मकर संक्रांति में गोचर करने पर मकर सक्रांति कहलाता है। और इस अवसर पर मकर सक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है। एक पुरानी मान्यता के अनुसार कहा जाता है ईस दिन नए फल और नए ऋतु का आगमन होता है और इसीलिए भी मकर संक्रांति मनाई जाती है। मकर सक्रांति एक ऐसा त्योहार है जिसका सांस्कृतिक और धार्मिक दोनों तरफ से ही महत्व है। मान्यता है कि मकर सक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि देव के घर जाते हैं और इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। शनि देव को मकर और कुंभ राशि का स्वामी कहा जाता है इसीलिए यह दिन पिता और पुत्र के एक अनोखे मिलन को दर्शाता है। मकर सक्रांति में तिल और गुड़ का बहुत ही महत्व होता है इस दिन तिल और गुड़ से बने लड्डू और कई अन्य मीठे पकवान बनाए जाते हैं।  

मकर सक्रांति कैसे मनाते हैं 

मकर सक्रांति विभिन्न राज्यों में विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है यह एक आनंद का पर्व है। क्योंकि वह समय होता है जब भारत में खारिश की नई फसल का स्वागत की जाती है इसीलिए इस दिन त्योहार के दौरान लोगों में बहुत प्रसन्नता और उत्साह देखने को मिलता है। इस दिन किसान भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उनकी फसल अच्छी हो फसल अच्छा होने के लिए भगवान से आशीर्वाद लेते हैं और इसीलिए इसे किसानों के त्योहारों के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन लोग सुबह उठकर स्नान करते हैं उसके बाद दान कार्य करते हैं दान को सिद्धा के नाम से भी जाना जाता है जिसे ब्राह्मण या किसी गरीब में बांट दिया जाता है। दान करने वाली सामग्री में खासकर चावल, उड़द की दाल, तिल इत्यादि जैसी चीजें होती है। महाराष्ट्र में इस दिन महिलाएं एक-दूसरे को तिल और गुड़ बांटती है और कहती है “तिल, गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो” । 

इस दिन तिल और गुड़ के लड्डू बनाने के पीछे महत्व छुपा है क्योंकि इस समय सर्दी का मौसम होता है जिस कारण तिल और गुड़ से बने लड्डू स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होते हैं। इसके अलावा मकर सक्रांति पर खिचड़ी बनाने खाने और दान करने का भी विशेष महत्व होता है। इसीलिए बहुत से जगहों पर इस पर्व को खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। वही असम में मकर सक्रांति को भोगाली बिहू या माघ बिहू के तौर पर मनाते हैं। इस अवसर पर असमिया जाति के लोग व असम के सभी लोग पकवान बनाते हैं और सुबह उठकर स्नान करके दही चुरा खाकर इस पर्व को मनाते हैं।

 मकर सक्रांति की दिन विभिन्न प्रकार की मिठाईयां बनाई जाती है। इस दिन खिचड़ी के साथ ही धन, गर्म कपड़े, तिल दान किए जाते हैं। कहा जाता है कि इस पर्व के अवसर पर दान करने से सनी त्रस्त व्यक्ति को कष्टों से मुक्ति देते हैं। गरीब अपाहिज लोग और मजदूर श्रेणी के सभी लोगों को शनि के प्रतिनिधि माना जाता है। इसीलिए इन्हें कभी भी सताना नहीं चाहिए इस दिन घर के बड़े बुजुर्गों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। उन्हें तिल से बनी मिठाइयां गर्म कपड़े उपहार स्वरूप दिया जाता है कहा जाता है कि ऐसा करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार माना जाता है कि मकर सक्रांति के दिन किए जाने वाला दान अन्य दिनों में किए जाने वाले दान की अपेक्षा बहुत अधिक होता है। 

मकर सक्रांति पर स्नान करने का बहुत महत्व है। जिस तरह मकर संक्रांति पर दान करने का महत्व है, तिल के लड्डू खाने का महत्व है, उसी तरह इस दिन बिना स्नान किए खाना नहीं चाहिए। इस दिन स्नान करना बहुत महत्व रखता है इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से ना केवल शरीर शुद्ध होता है बल्कि मन भी शुद्ध होता है। यही नहीं एक डेढ़ साल करने से सभी प्रकार पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य को मरने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन बच्चों में भी बहुत उत्साह देखने को मिलता है

क्योंकि यह दिन ऐसा होता है जिस पर उन्हें पतंग उड़ाने का भी मौका मिलता है। मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने का भी महत्व है इस दिन बच्चे पतंग उड़ाते हैं और मौज मस्ती करते हैं। इसीलिए मकर सक्रांति को “पतंग महोत्सव” के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन लोग अपने अपने घरो के छतों पर चढ़कर पतंग उड़ाते हैं। हालांकि पतंग उड़ाने के पीछे कुछ खास महत्व तो नहीं है लेकिन पतंग उड़ाने के पीछे कुछ देर सूर्य की रोशनी में बिताने का महत्व बताया जाता है। सर्दी के मौसम में सूर्य के प्रकाश शरीर के लिए बहुत लाभदायक होता है इसीलिए मकर सक्रांति पर पतंग महोत्सव होता है, जिसके पीछे स्वास्थ्यवर्धक कारण छुपा है।

आधुनिक मकर सक्रांति

पहले से बनाई जाने वाली मकर सक्रांति और वर्तमान समय में मनाई जाने वाली मकर सक्रांति में बहुत अंतर देखने को मिलता है। पहले के समय में इस दिन किसान लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता था। इस दिन किसान लोग अपने फसल की अच्छी उगाई के लिए भगवान से आशीर्वाद लेते थे इस दिन घर के अनाज जैसे कि चावल, आटा, गेहूं इत्यादि से कई तरह के खाने की सामग्री बनाते थे। चावल से कई तरह की मिठाई बनाकर, तिल, चिउड़ा इत्यादि से लड्डू बनाकर लोगों में बैठते थे और परिवार जनों के साथ बैठकर खाते थे। लेकिन आज के आधुनिक समय में घर पर उपलब्ध चीजों से खाने की विभिन्न तरह की सामग्रीयां नहीं बनाई जाती बल्कि बाजार में मिलने वाले सामग्री थोड़े-थोड़े खरीद कर घर में ले आते हैं और उसी से काम चला लेते हैं। आज के समय में लोग इस पर्व पर खाने से लेकर सजावटी सामान हर एक चीज बाजार से ही खरीद कर लाते हैं और पर्व मना लेते हैं। लेकिन किसी भी पर्व का असली मजा तो तब आता है जब उस पर्व में बनने वाले सामग्री एक-एक करके जुटाई जाए और खुद से बनाई जाए। लेकिन आज की बिजी भरी दुनिया में लोग छोटी-छोटी खुशियों को अनदेखा कर देते हैं और बड़ी खुशी पाने के लिए छोटे-छोटे त्योहारों की छोटी खुशी नहीं ले पाते। जैसे कि आप मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा को ही देख लीजिए पहले मकर सक्रांति पर आसमान भर जाता था। लेकिन आज आपको मकर सक्रांति के अवसर पर आसमान में पतंग देखने को नहीं मिलेंगे आज की आधुनिक दुनिया में बच्चे वीडियो गेम को ही ज्यादा महत्व देते हैं ना कि पर्व पर मनाए जाने वाले पतंग बाजी को।

Jhuma Ray
नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।

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