Tuesday, May 17, 2022
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“Christmas Day” जानिए क्रिसमस डे क्या है, क्यों, कैसे और कहां मनाया जाता है, इसके अलावा क्रिसमस डे के पीछे क्या इतिहास छिपा है

क्रिसमस या बड़ा दिन ईसा मसीह या यीशु के जन्म होने की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। यह दिन 25 दिसम्बर को पड़ता होता है एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ई.पू. के बीच हुआ था। और इस दिन लगभग पुरे विश्व में अवकाश रहता है। क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है। 25 दिसम्बर यीशु मसीह के जन्म की कोई वास्तविक जन्म तिथि नहीं हैं। इस तिथि को एक रोमन पर्व या मकर संक्रांति (शीत अयनांत) से संबंध स्थापित करने के आधार पर चुना गया है। कई संस्कृतियों में क्रिसमस  परंपरागत तरीके से मनाया जाने वाला  सर्दियों का सबसे लोकप्रिय त्योहार है। 

क्रिसमस डे क्यों मनाया जाता है  

क्रिसमस डे मनाने के पीछे एक कहानी छुपी है। एक बार भगवान ने मैरी नामक युवती के पास अपना एक दूत (ग्रैबियल) भेजा। दूत ग्रैबियल ने मैरी को जाकर कहा कि उसे एक भगवान के पुत्र को जन्म देना है। यह बात सुनकर मैरी आश्चर्य हो गई, क्योंकि अभी तो वह कुंवारी लड़की थी, इसीलिए उसने ग्रैबियल से पूछा कि यह कैसे संभव है? तो ग्रैबियल ने उसे कहा कि भगवान सब ठीक करेंगे। कुछ समय बाद जोसेफ नाम के एक युवक के साथ मैरी की शादी हो गई। शादी के बाद भगवान के दूत ग्रैबियल फिर से जोसेफ के सपने में आते हैं और कहते हैं कि जल्द ही मैरी गर्भवती होगी और उसे उसका खास ख्याल रखना होगा। क्योंकि उसकी होने वाली संतान कोई और नहीं बल्कि स्वयं प्रभु यीशु हैं। उस समय जोसेफ और मैरी नाजरथ में रहते थे, जो वर्तमान में इजराइल का एक भाग है। उस समय नाजरथ रोमन साम्राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था। एक बार किसी कारण से जोसेफ और मैरी किसी काम से बैथलेहम गए, जो इस समय फिलस्तीन में है। उन दिनों वहां बहुत से लोग आए हुए थे, जिस कारण वहा बहुत भीड़ थी और धर्मशालाएं और शरणालय सब भरे हुए थे जिस वजह से जोसेफ और मैरी को अपने लिए शरण नहीं मिल पाई। काफी थक जाने के बाद उन दोनों को एक अस्तबल में थोड़ी जगह मिली और उसी स्थान पर आधी रात के बाद प्रभु यीशु का जन्म हुआ। अस्तबल के निकट कुछ गडरिए अपनी भेड़ें चरा रहे थे, वहां भगवान के दूत प्रकट हुए और उन गडरियों को प्रभु यीशु के जन्म लेने की जानकारी दी। यह जानकर की जन्म लेने वाला शिशु प्रभु यीशु हैं तो गडरिए उस नवजात शिशु के पास गए और उसे नमन किए ।

यीशु जब बड़े हुए तो उन्होंने हर जगह घूम−घूम कर उपदेश दिए और लोगों की हर बीमारी और दुर्बलताओं को दूर करने का प्रयास किया। धीरे−धीरे उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलती गई। लेकिन कुछ लोग यीशु के सद्भावनापूर्ण कार्यों के दुश्मन भी थे, जिन्होंने आंखिरी में यीशु को काफी यातनाएं दीं और उन्हें क्रूस पर लटकाकर मार डाला। लेकिन यीशु अपना पूरा जीवन मानव कल्याण की दिशा में जुटे रहे, यही नहीं जब उन्हें कू्रस पर लटकाया जा रहा था, तब भी वह यही बोले कि ‘हे पिता इन लोगों को क्षमा कर दीजिए क्योंकि यह लोग अज्ञानी हैं।’ उसके बाद से ही ईसाई लोग 25 दिसम्बर यानि यीशु के जन्मदिवस को क्रिसमस के रूप में मनाते हैं।

क्रिसमस कैसे मनाते हैं   

आधुनिक क्रिसमस की छुट्टियों में लोग एक दूसरे को उपहार देते हैं, चर्च मे समारोह का आयोजन होता है विभिन्न प्रकार के सजावट करते हैं। इस सजावट के प्रदर्शन में  क्रिसमस का पेड़, रंग बिरंगी रोशनियां, बंडा, जन्म के झांकी और हॉली आदि शामिल हैं। सांता क्लॉज़ को क्रिसमस का पिता भी कहा जाता है हालांकि क्रिसमस और सांता क्लॉज़ दोनों का मूल भिन्न है। क्रिसमस एक बहुत ही लोकप्रिय पौराणिक कल्पित शख्सियत है, जिसे अक्सर क्रिसमस के अवसर पर बच्चों के लिए तोहफे लाने के लिए जाना जाता है। सांता के आधुनिक स्वरूप के लिए मुख्य रूप से मीडिया उत्तरदायी है।

क्रिसमस ईसाई लोगो का मुख्य त्यौहार है और इसे खास तौर से ईसाई लोग ही मनाते हैं हालाँकि आजकल कई गैर ईसाई लोग भी इसे एक धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक उत्सव के रूप मे मनाते हैं। क्रिसमस के दौरान उपहारों का आदान प्रदान, सजावट का सामन और छुट्टी के दौरान मौजमस्ती के कारण यह एक बड़ी और आर्थिक गतिविधि का उत्सव बन गया है। 

दुनिया भर के ज्यादातर देशों में यह 25 दिसम्बर के दिन मनाया जाता है। क्रिसमस की पहले दिन साम को यानि 24 दिसम्बर को ही जर्मनी तथा कुछ दूसरे देशों में इससे जुड़े समारोह शुरु हो जाते हैं। ब्रिटेन और अन्य राष्ट्रमंडल देशों में क्रिसमस के अगले दिन यानि 26 दिसम्बर “बॉक्सिंग डे के रूप में मनाया जाता है। कुछ कैथोलिक देशों में इसे सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता हैं। तो वहीं आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च 6 जनवरी को क्रिसमस मनाता है। पूर्वी परंपरागत गिरिजा जो जुलियन कैलेंडर को मानता है, वो 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाता है। 

“Christmas Day” जानिए क्रिसमस डे क्या है, क्यों, कैसे और कहां मनाया जाता है, इसके अलावा क्रिसमस डे के पीछे क्या इतिहास छिपा है

क्रिसमस की तैयारियां पहले से ही होने लगती हैं इस दिन ईसाई लोग अपने घर को भलीभांति सजाते हैं। क्रिसमस के अवसर पर लगभग एक सप्ताह तक छुट्‍टी रहती है। बाजारों की रौनक बढ़ जाती है। घर से लेकर बाजार रंगीन रोशनियों से जगमगा उठते हैं। चर्चो में विशेष प्रार्थनाएं होती हैं। लोग अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों से मिलने उनके घर जाते हैं गिफ्ट देते हैं . इस दिन आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। इस पेड़ को विशेष तरह से सजाया जाता है। इस त्योहार में केक का विशेष महत्व होता है। क्रिसमस में मीठे, मनमोहन, केक काटकर खिलाने का बहुत पुरानी परम्परा है। लोग एक-दूसरे को केक खिलाकर इस पर्व की बधाई देते हैं। कोई एक व्यक्ति सांताक्लाज का रूप लेकर बच्चों को चॉकलेट, उपहार आदि देता है। ऐसी मान्यता है कि सांताक्लाज स्वर्ग से आता है और लोगों को मनचाही चीजें उपहार के तौर पर देकर चला जाता है।     

प्रभु यीशु मसीह की जन्म गाथा को नाटक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। कई जगह क्रिसमस की पहले दिन रात को गि‍‍‍‍रिजाघरों में रात्रिकालीन प्रार्थना सभा होती है। यह प्राथना रात के 12 बजे तक चलती है। ठीक 12 बजे लोग अपने प्रियजनों को क्रिसमस की बधाइयां देते हैं और खुशियां मनाते हैं। क्रिसमस की सुबह गि‍‍‍‍रिजाघरों में फिर से विशेष प्रार्थना सभा होती है। कई जगह क्रिसमस के दिन मसीह समाज द्वारा जुलूस निकाले जाते है। जिसमें प्रभु यीशु मसीह की झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं। सिर्फ ईसाई समुदाय ही नहीं, कई अन्य धर्मों के लोग भी इस दिन चर्च में मोमबत्तियां जलाकर प्रार्थना करते हैं। क्रिसमस का दिन बच्चों के लिए सबसे ज्यादा खुशी और आकर्षण का केंद्र होता है। सांताक्लॉज, जो लाल और सफेद कपड़ों में बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार और चॉकलेट्स लेकर आता है। यह एक काल्पनिक किरदार होता है जिसके प्रति बच्चों का लगाव होता है। 

क्रिसमस डे का इतिहास

बाइबल में जीसस के जन्म का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।  लेकिन फिर भी 25 दिसंबर को हर साल क्रिसमस डे के रूप में मनाया जाता है। इस तारीख को लेकर कई बार विवाद भी हो चुका है। इससे जुड़ी एक नहीं बल्कि कई मान्यताएं हैं। 

एक मान्यता के अनुसार, सबसे पहले रोमन के पहले ईसाई सम्राट Constantine के समय 25 दिसंबर को क्रिसमस डे मनाया गया था। इसके कुछ सालों बाद पॉप जूलियस ने 25 दिसंबर को 
आधिकारिक तौर पर जीसस का जन्मदिन को क्रिसमस डे के रूप में मनाने का ऐलान किया था। 

और एक मान्यता के अनुसार 25 मार्च को मैरी ने गर्भाधान के बारे में बताया की वह एक विशेष बच्चे को जन्म देंगी जिनका नाम जीसस होगा। और इसलिए भी 25 दिसंबर को क्रिसमस डे के रूप में मनाया जाता है। 

सामाजिक पर्व बन गया है क्रिसमस

क्रिसमस सिर्फ एक धार्मिक पर्व ही नहीं है यह अब एक सामाजिक पर्व बन चूका है।  इसीलिए अब सभी समुदायों के लोग इसे बढ़−चढ़कर मनाते हैं। क्रिसमस हंसी−खुशी का त्यौहार है, इस दिन पुरे विश्व के गिरजाघरों में प्रभु यीशु की जन्मगाथा की झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं। और गिरजाघरों में प्रार्थना की जाती है। क्रिसमस को सभी ईसाई लोग मनाते हैं और आजकल कई गैर ईसाई लोग भी इस उत्सव को एक धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक उत्सव के रूप में बहुत ही उत्साह के साथ मनाते हैं। क्रिसमस के दौरान उपहारों का आदान−प्रदान होता है, सजावट का सामान और छुट्टी के दौरान मौज-मस्ती के कारण यह एक बड़ी आर्थिक गतिविधि भी बन गया है। 

Jhuma Ray
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नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।
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