Wednesday, May 18, 2022
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बड़े धूम-धाम से मनाया गया बाँके बिहारी का प्राकट्य उत्सव, निधिवन से निकली बाँके बिहारी मंदिर तक शोभा यात्रा में झूमते गए श्रद्धालु।

श्रीधाम वृन्दावन, यह एक ऐसी पावन भूमि है, जिस भूमि पर आने मात्र से ही व्यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता है। ऐसा आख़िर कौन व्यक्ति होगा जो इस पवित्र भूमि पर आना नहीं चाहेगा। और श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन करके अपने को कृतार्थ करना नहीं चाहेगा। यह मन्दिर श्री वृन्दावन धाम के एक सुन्दर इलाके में स्थित है। कहा जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण स्वामी श्री हरिदास जी के वंशजो के सामूहिक प्रयास से संवत 1921 के लगभग किया गया। इस मंदिर में बांके बिहारी जी की जो मूर्ति/प्रतिमा है वह कहीं से लाई गई नहीं है और ना ही वह मूर्ति बनाई गई है बल्कि वह भक्ति व साधना से उत्पन्न की गई मूर्ति है।

कैसे मनाया गया बाँके बिहारी का प्राकट्य उत्सव 

19 दिसंबर साल 2020, वृंदावन में ठाकुर बाँके बिहारी के प्रकट हुए स्थल पर जोरदार उत्सव की धूम मची। बाँके बिहारी के उत्पत्ति तिथि के अवसर पर निधिवन में भव्य सजावट की गई। आज से 515 साल पहले आज ही के दिन मथुरा के निधिवन में बाँके बिहारी जी की मूर्ति मिली थी। वृंदावन के लोगों में इस दिन गजब का एक उत्साह देखने को मिला। सुबह उठते ही ठाकुर बाँके बिहारी जी को पंचामृत से अभिषेक किया गया अब ठाकुर बाँके बिहारी 515 वर्ष के हो गए हैं। आज ठाकुर बाँके बिहारी जी के उत्पति स्थल में भव्य सजावट किए गए। सुबह होते ही वृंदावन में बाँके बिहारी को पंचामृत से अभिषेक कराया गया और निधिवन से विश्वप्रसिद्ध बाँके बिहारी मंदिर तक भव्य शोभायात्रा निकाली गई।

इस उपलक्ष में निधिवन से बाँके बिहारी मंदिर तक वहां के रात भर शोभायात्रा निकाली गई। वृंदावन में इस शोभायात्रा के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों भक्त आए हुवे हैं। निधिवन से निकलने वाली बाँके बिहारी जी की मूर्ति बहुत रहस्यमयी मानी जाती है। वहां के स्थानीय लोगों के मुताबिक भगवान कृष्ण ना केवल रोज वहां आते हैं, बल्कि वहां पर रासलीला भी करते हैं। ठाकुर बाँके बिहारी को और उनकी प्राकट्य स्थली श्री निधिवन को विशेष रूप से सजाया गया था। निधिवन में समाज गायन का भी आयोजन किया गया था, और यह तैयारियां गोस्वामीगण और मंदिर प्रबंधन द्वारा की गयी थी। मंदिर में सुबह 4:30 बजे ठाकुर जी को पंचामृत से अभिषेक किया गया और केसर हलवा का मोहन भोग लगाया गया।

क्यों मनाया गया बांके बिहारी का प्राकट्य उत्सव 

19 दिसंबर साल 2020, वृंदावन में ठाकुर बाँके बिहारी के प्रकट हुए स्थल पर जोरदार आयोजन हुए थे क्योंकि यहीं ठाकुरजी बाँके बिहारी की मूर्ति प्रकट हुई थी।और इस बार हर वृंदावन वासी के आराध्य ठाकुर बाँके बिहारी 515 वर्ष के हो गए हैं। ठाकुर बाँके बिहारी का प्राकट्य उत्सव 19 दिसंबर अगहन सुदी पंचमी (विहार पंचमी) को मनाया गया। 515 वें प्राकट्य उत्सव पर झूमने के लिए कान्हा की नगरी पूरी तरह से तैयार की गई थी। बाँके बिहारी की प्राकट्य स्थली निधिवन में भव्य सजावट की गई थी। निधिवन के सेवायत भीख चंद्र गोस्वामी ने बताया कि अगहन सुदी पंचमी को विहार पंचमी अर्थात ठाकुर श्री बाँके बिहारी जी महाराज का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है।   

कैसे हुई थी बाँके बिहारी की उत्पत्ति 

माना जाता है की निधिवन में बाँके बिहारी जी की मूर्ति हरिदास के आराध्य पर प्रकट हुवे थे। बाँके बिहारी मंदिर भारत में मथुरा जिले के वृंदावन धाम में रमण रेती पर स्थित है यह मंदिर भारत के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बांके बिहारी कृष्ण का ही एक रूप है जो इसमें प्रदर्शित किया गया है। इसका निर्माण 1864 में स्वामी हरिदास ने करवाया था। ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा ने बताया कि मथुरा के जिलाधिकारी रहने वाले एफएस ग्राउस की पुस्तक मथुरा-ए-डिस्ट्रिक्ट में बाँके बिहारी मंदिर का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा हैं कि उक्त मंदिर का निर्माण 70 हजार रुपये की लागत से हुआ है। शिल्प की दृष्टि से यह एक सुंदर मंदिर है।

वृंदावन स्थित श्री बाँके बिहारी का मंदिर विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर के विशाल चौक में ऊंचे जगमोहन के पीछे निर्मित गर्भग्रह में भव्य सिंहासन पर ठाकुर बाँके बिहारी विराजते हैं। श्री  बाँके बिहारी के प्राकट्य को लेकर कहा जाता है कि हरिदास के शिष्य विट्ठल विपुलदेव और बिहारिन दास ने एक बार उनसे पूछा था कि जिस निकुंज के सामने आप संगीत साधना करते हैं, उसका क्या रहस्य है?

बड़े धूम-धाम से मनाया गया बाँके बिहारी का प्राकट्य उत्सव, निधिवन से निकली बाँके बिहारी मंदिर तक शोभा यात्रा में झूमते गए श्रद्धालु।

फिर स्वामी हरिदास ने जवाब दिया की एक बार उन्होंने कहा था कि सब समाज को बुलाओ और तब समाज के सब लोग वहां एक जुट हो गए। तब हरिदास ने स्वर लहरियों को छेड़ते हुए गाया- माई री सहज जोरी प्रगट भई जु रंग की गौर श्याम घन दामिनी जैसे…। इसके बाद धीरे-धीरे प्रकाश का पुंज बढ़ता गया और उस प्रकाश पुंज के मध्य परस्पर हाथों में हाथ लिए मुस्कुराते हुए स्याम-कुंजबिहारी प्रकट हुए। हरिदास की प्रार्थना पर यह युगल जोड़ी एकाकार हो गई। आज श्रद्धालु लोग बाँके बिहारी के जिस स्वरुप की दर्शन करते हैं, वह श्री बाँके बिहारी जी के प्रिया-प्रीतम का ही स्वरूप है। 
श्री बाँके बिहारी की मूर्ति कई रहस्यों से भरी है 

एक कहानी के अनुसार कहा जाता है की श्री बाँके बिहारी जी मन्दिर में सामने के दरवाजे पर एक पर्दा लगा रहता है और वो पर्दा एक दो मिनट के अंतराल पर बन्द किया जाता है और खोला जाता हैं।

एक बार एक भक्त ने देखा की मंदिर में श्री बाँके बिहारी जी नहीं थे। पुजारी जी ने जब मन्दिर की कपाट खोला तो उन्हें श्री बाँके बिहारी जी नहीं दिखाई दिये। फिर पता चला कि बाँके बिहारी किसी के भक्ति से वशीभूत होकर  अपने भक्त की गवाही देने अलीगढ़ पहुंच गये हैं। तभी से ऐसा नियम बना दिया गया कि झलक दर्शन में ठाकुर जी का पर्दा खुलता रहेगा और बन्द होता रहेगा। ऐसे ही बाँके बिहारी जी की और बहुत सारी कहानियाँ प्रचलित है। 

श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन से जुड़ी कई कहानियाँ प्रचलित हैं 

एक कथा अनुसार कहा जाता है की एक बार एक भक्तिमती नारी ने अपने पति को बहुत विनय करने के बाद वृन्दावन जाने के लिए राजी किया। और दोनों वृन्दावन आकर श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन करने लगे। कुछ दिन श्री बिहारी जी के दर्शन करने के पश्चात उसके पति ने जब घर वापस लौटने कि बात की तो भक्तिमति ऐसा सोचकर वो रोने लगी की अब उसे श्री बिहारी जी के दर्शन लाभ से वंचित होना पड़ेगा। संसार बंधन के लिए फिर से संसारिक जीवन जीने के लिए उसे घर जाना पड़ेगा, ऐसा सोचकर वो श्रीबिहारी जी के सामने रोते–रोते प्रार्थना करने लगी कि– ‘हे प्रभु में घर जा रही हुँ, लेकिन तुम हमेशा के लिए मेरे ही पास निवास करना। ऐसा प्रार्थना करने के बाद वे दोनों रेलवे स्टेशन की ओर घोड़ागाड़ी में बैठकर चल दिए। उस समय श्री बाँके विहारी जी ने एक गोप बालक का रूप धारणकिया और घोड़ागाड़ी के पीछे आकर उनको साथ लेकर ले जाने के लिये भक्तिमति से प्रार्थना करने लगे। इधर पुजारी ने मंदिर में ठाकुर जी को न देखकर वह समझ गए उन्होंने भक्तिमति के प्रेमयुक्त घटना को जान लिया और तत्काल वे घोड़ा गाड़ी के पीछे दौड़े। गाड़ी में बालक रूपी श्री बाँके बिहारी जी से प्रार्थना करने लगे। दोनों में ऐसा वार्तालाप चलते समय वो बालक उनके मध्य से गायब हो गया, तब पुजारी जी फिर से मन्दिर लौटकर पुन श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन करने लगे।

इधर भक्त तथा भक्तिमति श्री बाँके बिहारी जी की ऐसी कृपा के बारे में जानकर दोनों ने संसार का गमन त्याग किया और हमेशा के लिए श्री बाँके बिहारी जी के चरणों में अपने जीवन को समर्पित कर दिया। ऐसे ही अनेकों कारण व कहानियां प्रचलित है जिस वजह से श्री बाँके बिहारी जी के झलक दर्शन अर्थात झाँकी दर्शन होते हैं। 

श्री बाँके बिहारी जी निधिवन में ही बहुत समय तक स्वामी जी द्वारा सेवित होते रहे थे। फिर जब मन्दिर का निर्माण कार्य सम्पन्न हो गया, तब उनको वहाँ लाकर स्थापित कर दिया गया। फिर इन्होंने संवत साल 1975 में हरगुलाल सेठ जी को श्री बिहारी जी के सेवा की व्यवस्था सम्भालने के लिए नियुक्त किया। तब इस सेठ ने वेरी, कोलकत्ता, रोहतक, इत्यादि स्थानों पर श्री बाँके बिहारी ट्रस्टों की स्थापना की। 

इसके अलावा अन्य भक्तों का सहयोग भी इसमें काफी सहायता प्रदान कर रहा है। खुशी की बात तो यह है कि जब काला पहाड़ के उत्पात की आशंका से ढ़ेर सारे विग्रह स्थानान्तरित हुए। लेकिन श्री बाँके विहारी जी यहां से स्थानान्तरित नहीं हुए, आज भी उनकी यहां प्रेम सहित पूजा चल रही हैं। 

कालान्तर में स्वामी हरिदास जी के उपासना पद्धति में परिवर्तन लाकर एक नये सम्प्रदाय, निम्बार्क संप्रदाय से स्वतंत्र होकर सखीभाव संप्रदाय बना। इसके अनुसार वृन्दावन के सभी मन्दिरों में सेवा और महोत्सव आदि मनाए जाते हैं। श्री बाँके बिहारी जी मन्दिर में केवल शरद पूर्णिमा के दिन श्री बाँके बिहारी जी वंशीधारण करते हैं। केवल श्रावन तीज के दिन ही ठाकुर जी झूले पर बैठते हैं। और जन्माष्टमी के दिन ही केवल उनकी मंगला–आरती होती हैं। जिसके दर्शन सौभाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं। और श्री बाँके बिहारी जी के चरण दर्शन तो केवल अक्षय तृतीया के दिन ही होता है। जो व्यक्ति इन चरण-कमलों का दर्शन करता है, उसका तो बेड़ा ही पार ही हो जाता है। स्वामी हरिदास जी संगीत के प्रसिद्ध गायक एवं तानसेन के गुरु थे।

एक दिन प्रातःकाल स्वामी जी देखे कि उनके बिस्तर पर कोई रजाई ओढ़कर सो रहा हैं। यह देखकर स्वामी जी बोले– अरे मेरे बिस्तर पर कौन सो रहा हैं। स्वामी जी के बिस्तर पर कोई और नहीं श्रीबिहारी जी स्वयं सो रहे थे। स्वामी जी के शब्द सुनते ही बिहारी जी निकल भागे। लेकिन वे अपने चुड़ा एवं वंशी, को विस्तर पर ही रखकर चले गये। स्वामी जी, वृद्ध अवस्था में दृष्टि जीर्ण होने के कारण उनकों कुछ नजर नहीं आया। इसके बाद मंदिर के पुजारी ने जब मन्दिर में कपट खोले तो उन्हें श्री बाँके बिहारी जी के पलने में चुड़ा एवं वंशी नजर नहीं आयी, लेकिन मन्दिर का दरवाजा बन्द था। आश्चर्यचकित होकर पुजारी जी निधिवन में स्वामी जी के पास आए और स्वामी जी को सभी बातें बतायी। 

स्वामी जी बोले कि प्रातःकाल कोई मेरे पंलग पर सोया हुआ था। वो जाते समय कुछ छोड़ गया हैं। तब पुजारी जी ने प्रत्यक्ष देखा कि पंलग पर श्री बाँके बिहारी जी का चुड़ा और वंशी विराजमान हैं। इससे प्रमाणित होता है कि श्री बाँके बिहारी जी रात को रास करने के लिए निधिवन जाते हैं। और इसी कारण प्रातःकाल श्रीबिहारी जी की मंगला–आरती नहीं होती हैं। कारण रात्रि में रास करके यहां बिहारी जी आते है। अतः प्रातः शयन में बाधा डालकर उनकी आरती करना अपराध होगा। 

कहा जाता है की स्वामी हरिदास जी के दर्शन प्राप्त करने के लिए अनेकों सम्राट यहाँ आते थे। एक बार दिल्ली के सम्राट अकबर स्वामी जी के दर्शन यहां आए थे। ठाकुर जी के दर्शन प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम 6 बजे से रात्रि 9 बजे तक होते हैं। और कभि तिथि अनुसार समय में परिवर्तन भी कर दिया जाता हैं।

मन्दिर निर्माण के शुरूआत में किसी दान-दाता का धन इसमें नहीं लगाया गया। श्री हरिदास स्वामी विषय उदासीन वैष्णव थे। उनके भजन–कीर्तन से प्रसन्न होकर श्री बाँके बिहारी जी निधिवन से प्रकट हुवे थे। स्वामी हरिदास जी का जन्म संवत 1535 यानि सन 1478 में भाद्रपद महिने के शुक्ल पक्ष में अष्टमी तिथि के दिन वृन्दावन के निकट राजपुर नामक गाँव में हूआ था। स्वामी हरिदास जी कृष्ण के उपासक, शास्त्रीय संगीतकार और सखी संप्रदाय के प्रवर्तक थे। इनके आराध्य देव श्याम-सलोनी सूरत बाले श्री बाँके बिहारी जी थे। इनके पिता का नाम था गंगाधर और माता का नाम श्रीमती चित्रा देवी था। हरिदास जी, स्वामी आशुधीर देव जी के शिष्य थे। इन्हें देखते ही आशुधीर देव जी को पता चल गया था कि ये सखी ललिताजी के अवतार हैं। और राधाष्टमी के दिन भक्ति प्रदायनी श्री राधा जी के मंगल महोत्सव का दर्शन करने के लिए ही यहाँ पधारे है। हरिदास जी को रसनिधि सखी का अवतार माना गया है। ये बचपन से ही संसार से ऊबे रहते थे। 

किशोरावस्था में इन्होंने आशुधीर जी से युगल मन्त्र दीक्षा ली और यमुना के निकट निकुंज में एकान्त स्थान पर जाकर ध्यान-मग्न रहने लगे। जब ये 25 वर्ष के हुए तब इन्होंने अपने गुरु जी से विरक्तावेष प्राप्त किया एवं संसार से दूर होकर निकुंज बिहारी जी के नित्य लीलाओं का चिन्तन करने लगे। निकुंज वन में ही स्वामी हरिदासजी को बिहारीजी की मूर्ति निकालने का स्वप्नादेश हुआ था। तब उनकी आज्ञा अनुसार मनोहर श्यामवर्ण छवि वाले श्रीविग्रह को धरा को गोद से बाहर निकाला गया। यही सुन्दर मूर्ति जग में श्री बाँके बिहारी जी के नाम से विख्यात हुई। यह मूर्ति मार्गशीर्ष, शुक्ला के पंचमी तिथि को निकाला गया था। अतः प्राकट्य तिथि को हम विहार पंचमी के रूप में बड़े ही उल्लास के साथ मानते है। युगल किशोर सरकार की मूर्ति राधा कृष्ण की संयुक्त छवि या ऐकीकृत छवि के कारण बाँके बिहारी जी के छवि के मध्य एक अलौकिक प्रकाश की अनुभूति होती है। जो बाँके बिहारी जी के छवि में राधा तत्व का परिचायक होता है। 

एक समय की बात है उनके दर्शन के लिए एक भक्त महानुभाव उपस्थित हुए। वे बहुत देर तक एक-टक से बाँके बिहारी जी को निहारते रहे। रास रचाने वाले श्री बाँके बिहारी जी उन पर रीझ गए और उनके साथ ही उनके गाँव चले गए। बाद में बिहारी जी के गोस्वामियों को पता लगने पर उनका पीछा किया और बहुत अनुनय-विनय करके ठाकुरजी को लौटकर मन्दिर में पधारने के लिए प्रार्थना किया। इसीलिए बिहारी जी के झाँकी दर्शन की व्यवस्था की गई, ताकि कोई उनसे नजर न लड़ा सके। 

इस मंदिर और श्री बाँके बिहारी जी पर लोगो की आस्था इतनी ज्यादा है कि गत आश्विन शुक्ल पंचमी को दर्शनार्थ आए भक्तों में से एक भक्त जिन्हें आँखों से कुछ नहीं दिखता था,जिज्ञासा बस पूछा बाबा आप देखने में असमर्थ है, फिर भी बिहारी जी के दर्शन हेतु पधारे हैं। उन्होंने उत्तर दिया की “हाँ लाला मुझे नहीं दिखता है,पर बिहारी जी मुझे देख रहे हैं”।  

Jhuma Ray
Jhuma Ray
नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।
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