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कितना जानते हैं आप अपने देश के संविधान के बारे में ? आइए जानते हैं भारतीय संविधान के बारे में।

भारतीय संविधान हमारे देश का मूल भूत रूप है। इसीलिए हम सबको अपने संविधान के बारे में जरूर पता होना चाहिए। तो चलिए जानते हैं संविधान से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में जो हम सबको पता होनी चाहिए। क्योंकि हम इस देश के नागरिक हैं और यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम हमारे संविधान से जुड़ी बातों को जाने और अपने देश के संविधान के प्रति बनने वाले अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा और आस्था से निभाए।

भारतीय संविधान भारतवर्ष का सर्वोच्च विधान है। भारतीय संविधान को संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर साल 1949 को पारित किया गया था और 26 नवंबर साल 1950 से प्रभावी हुआ। भीमराव अंबेडकर को भारतीय संविधान का प्रधान वास्तुकार और निर्माता कहा जाता है। भारत का संविधान विश्व के किसी भी गणतांत्रिक देश का सबसे बड़ा संविधान है।

संविधान सभा की पहली बैठक दिसंबर के महीने में साल 1946 में हुई थी। इसके तुरंत ही देश को भारत और पाकिस्तान करके दो हिस्सों में बांट दिया गया था। और संविधान सभा भी तब दो हिस्सों में बंट गई। भारत का संविधान सभा और पाकिस्तान की संविधान सभा अलग-अलग बन गई।

भारतीय संविधान सभा में 299 सदस्य थे और उस बैठक के अध्यक्ष थे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद थे। भारत ने 26 नवंबर 1949 को अपना काम पूरा करके 26 नवंबर साल 1950 को भारत के संविधान सभा को लागू कर दिया। लागू होने के बाद इस दिन की याद में हर साल 26 नवंबर को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के संविधान को संपूर्ण रूप से तैयार करने में 2 साल 11 महीने और 18 दिन का समय लगा था।

कितना जानते हैं आप अपने देश के संविधान के बारे में ? आइए जानते हैं भारतीय संविधान के बारे में।

भारतीय संविधान के वर्तमान समय में भी सिर्फ 470 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं और यह 25 भागों में विभाजित किए गए हैं। लेकिन इसके निर्माण के समय मूल संविधान में 395 अनुच्छेद जो 22 भागो में विभाजित थे, इसमें सिर्फ 8 अनुसूचियाँ थी।

सामूहिक रूप से मंत्रिपरिषद लोगों के सदन के प्रति उत्तरदाई होते हैं। हर एक राज्य में एक विधानसभा होता है बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना में एक ऊपरी सदन है जिसे विधान परिषद कहा जाता है। तो वहीं राज्य का प्रमुख होता है राज्यपाल, प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होता है और राज्य की कार्यकारी शक्ति उसीमें निहित होती है। मंत्री परिषद का प्रमुख होता है मुख्यमंत्री, राज्यपाल को उसके कार्यकारी कार्यों का निष्पादन करने में मुख्यमंत्री सलाह देती है। भारतीय संविधान के सातवीं अनुसूची में भारत के संसद तथा राज्य विचार विधायिकायो के बीच विधायी शक्तियों का विवरण किया गया है और यह शक्तियां संसद में विहित है। केंद्रीय प्रशासनिक भू-भागों को संघराज्य क्षेत्र कहा जाता है।

संविधान सभा का इतिहास

दितीय विश्व युद्ध के समाप्ति के बाद साल 1945 में जुलाई के महीने में ब्रिटेन ने भारत संबंधी अपनी नई नीति की घोषणा की और भारत के संविधान सभा के निर्माण के लिए एक कैबिनेट मिशन भेजा। उस कैबिनेट मिशन में तीन मंत्री थे साल 1947 में 15 अगस्त को भारत के आज़ाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा की गई और इसने अपने कार्य साल 1947 में 9 दिसंबर से आरंभ कर दिए। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने गए थे। जिनमें जवाहरलाल नेहरू, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, बल्लभ सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद इत्यादि इसी सभा के प्रमुख सदस्य थे।

इस संविधान सभा ने 2 साल 11 महीने और 18 दिन में 114 दिन तक बहस कीए। उसके बाद संविधान सभा में कुल 12 अधिवेशन किए गए अंतिम दिन 284 सदस्यों ने इस पर अपने हस्ताक्षर किए और संविधान बनने में 166 दिन बैठक की गई। इस बैठक में प्रेस और जनता को भी भाग लेने का अधिकार था।

संविधान निर्माण में संविधान सभा के 3 सभी सदस्यों ने अपनी अपनी अलग-अलग महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 26 नवंबर साल 1949 को संविधान सभा ने पारित किया और इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था। इस संविधान में सर्वाधिक प्रभाव भारत शासन अधिनियम 1935 का है। संविधान में करिब 250 अनुच्छेद इस अधिनियम से लिया गया है।

भारतीय संविधान की अनुसूचियां

  • भारत के मूल संविधान में मूलत: 8 अनुसूचियां थी लेकिन वर्तमान भारतीय संविधान में 12 अनुसूचियां हैं।
  • भारतीय संविधान में नौवीं अनुसूची प्रथम संविधान संशोधन साल 1951,
  • दसवीं अनुसूची 52 वें संविधान संशोधन साल 1985,
  • ग्यारवीं अनुसूची 73वें संविधान संशोधन साल 1992,
  • और बारहवीं अनुसूची 74 वें संविधान संशोधन साल 1992 द्वारा सम्मानित किया गया था।

संविधान के प्रारूप समिति और सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान को संघात्मक संविधान माना है। लेकिन विद्वानों में अभी भी मतभेद है अमेरिकी विद्वान भारतीय संविधान को “छद्म संघात्मक संविधान” कहते हैं। संविधान का संघात्मक होना उसमें निहित संघात्मक लक्षणों पर निर्भर करता है। लेकिन माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पूर्ण संघात्मक माना है। भारतीय संविधान के प्रस्तावना के अनुसार भारत एक सम्प्रभुता संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है।

संप्रभुता शब्द का अर्थ

संप्रभुता शब्द का मतलब होता है सर्वोच्च या स्वतंत्र होना। भारत किसी भी विदेशी और आंतरिक शक्ति के नियंत्रण से पूर्णत: मुक्त संप्रभुता संपन्न राष्ट्र है। यह सीधे लोगों द्वारा चुने गए एक मुक्त सरकार द्वारा शासित है और यही सरकार, कानून बनाकर लोगों पर शासन करती है।  

समाजवादी

भारतीय संविधान के प्रस्तावना में समाजवादी शब्द को साल 1976 में हुए 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा जोड़ा गया था। यह अपने देश के सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता निश्चित करता है। यह किसी भी व्यक्ति में जाति, धर्म, लिंग, भाषा, नस्ल, रंग के आधार पर काम नहीं करती। यह किसी भी नागरिक में भेदभाव किए बिना देश के हर नागरिक को बराबर का दर्जा देती है। समाजवाद के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई कानून जैसे कि अस्पृश्यता का उन्मूलन, समान वेतन अधिनियम, जमीदारी अधिनियम और बाल श्रम निषेध अधिनियम इत्यादि बनाई है।

धर्मनिरपेक्ष

भारतीय संविधान के प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द को संविधान के साल 1976 में हुए 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा जोड़ा गया था। धर्मनिरपेक्षता का मतलब होता है किसी भी धर्म के लोगों के प्रति सामान मनोभाव रखना। यह किसी भी धर्म के नागरिकों में समानता और धार्मिक सहिष्णुता सुनिश्चित करता है।

भारत का कोई आधिकारिक धर्म तो नहीं है। यह ना तो किसी धर्म को बढ़ावा देता है और ना ही किसी से भेदभाव करता है। यह सभी धर्म के लोगों को सम्मान करता है व एक समान व्यवहार करता है। हर एक व्यक्ति को अपने पसंद के किसी भी धर्म की उपासना करने, पालन करने और प्रचार का अधिकार प्रदान करता है। सभी नागरिकों को चाहे उनकी धार्मिक मान्यता कुछ और भी क्यों ना हो कानून की नजर में सब बराबर होते हैं। सरकारी स्कूल या सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कोई धार्मिक अनुदेश लागू नहीं किए जाते।

 लोकतांत्रिक

भारत एक स्वतंत्र देश है किसी भी जगह से वोट देने की आजादी संसद में अनुसूचित सामाजिक समूहो और अनुसूचित जनजातियों को विशिष्ट सीटें आरक्षित की गई है। तो वहीं स्थानीय निकाय चुनाव में भी महिला उम्मीदवारों के लिए एक निश्चित अनुपात में सीटें आरक्षित होती है। सभी चुनाव में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का एक विधेयक लंबित है।

शक्ति विभाजन

शक्ति विभाजन भारतीय संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण है जो राज्य की शक्तियां केंद्रित और राज्य सरकारों में विभाजित होते हैं दोनों सजाएं एक दूसरे के अधीन नहीं होती वे संविधान से उत्पन्न और नियंत्रित होती है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना

भारतीय संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने के लिए उनसे पहले एक प्रस्तावना प्रस्तुत की जाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। जो अमेरिका संविधान से प्रभावित है प्रस्तावना के नाम से भारतीय संविधान की सारे अपेक्षाएं, उद्देश्य, उसका लक्ष्य और दर्शन प्रकट होता है। हमारी प्रस्तावना “हम भारत के लोग” इस वाक्य से प्रारंभ होती है इसका मतलब प्रस्तावना यह बताती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करती है।

कितना जानते हैं आप अपने देश के संविधान के बारे में ? आइए जानते हैं भारतीय संविधान के बारे में।

भारत में राज्यों का संघ

हमारा भारतवर्ष एक राज्यों का संघ है यह संसदीय प्रणाली की सरकार वाला एक स्वतंत्र प्रभुसत्ता संपन्न समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। यह गणराज्य भारत के संविधान के अनुसार शासित है जिसे संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर साल 1949 को ग्रहण किया गया था और जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

सबसे बड़ा संविधान

पूरे विश्व में हमारे भारत का संविधान सबसे बड़ा लिखित संविधान है। संविधान के लागू होने के समय इसमें 395 अनुच्छेद व 8 अनुसूचियां और 22 भाग थे। जो कि वर्तमान में बढ़कर 448 अनुच्छेद 12 अनुसूचियां और 25 हो गए हैं। इसके अलावा इसमें पांच परिशिष्ट भी जोड़े गए हैं जो कि पहले नहीं थे।

संविधान सभा के सदस्य

संविधान सभा के 284 सदस्यों ने 24 जनवरी साल 1950 को दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें 15 महिलाएं भी शामिल थी। इसके बाद 26 जनवरी को भारत का संविधान अस्तित्व में आया। इसे पारित करने में 2 वर्ष 11 महीने और 18 दिन का समय लगा था।

भारतीय संविधान की विशेषताएं

भारत के संविधान की विशेषताएं बहुत है भारत का संविधान संघात्मक भी है और एकात्मक भी। भारत के संविधान में संघात्मक संविधान की सभी उपर्युक्त विशेषताएं शामिल है। आपातकाल में भी भारतीय संविधान में एकात्मक संविधान के अनुरूप केंद्र को ज्यादा शक्तिशाली बनाने के लिए प्रावधान निहित है। भारतीय संविधान केवल एक नागरिकता का ही समावेश किया गया है। और एक ही संविधान केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों के कार्य संचालन के लिए व्यवस्थाएं प्रदान करते हैं। इसके अलावा संविधान में कुछ अच्छी चीज़े भी विश्व के दूसरे संविधान उसे संकलित किए गए हैं।

भारतीय संविधान के तीन प्रमुख बिंदु है

भारत का संविधान तीन प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है। पहला राजनीतिक सिद्धांत के अनुसार हमारा भारत एक लोकतांत्रिक देश होगा यह सार्वभौमिक होगा और धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा। दूसरा भारत की सरकारी संस्थाओं के बिच किस प्रकार का संबंध होगा ? वे एक दूसरे के साथ किस प्रकार मिलकर कार्य करेंगे, सरकारी संस्थाओं के क्या अधिकार होंगे क्या कर्तव्य होंगे, किस प्रकार की प्रक्रिया संस्थाओं पर लागू होगी। तीसरा बिंदु यह है कि भारतीय नागरिकों को कौन कौन से मौलिक अधिकार प्राप्त होंगे और उनके कर्तव्य क्या होंगे इसके अलावा राज्य के कौन से नीति निर्देशक तत्व होंगे।

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दूसरे देशों से भारतवर्ष के अलग होने की कुछ वजह

अन्य किसी दूसरे देश में हमारे भारतवर्ष जैसी धार्मिक, भाषाई व जातीय विविधताएं नहीं है। पश्चिम यूजर पियो और नई दुनिया के देशों में ही भारत के तरह कुछ विषमता देखी जाती है। यहां के समुदायों में शुद्धता और और अशुद्धता की धारणाओं पर आधारित व्यवस्था व्यापक रूप में विद्यमान है। हमारे भारतवर्ष जैसे नातेदारियों में बंधा हुआ एक समाज, ऊंच-नीच की मान्यता और सहगोत्रीय विवाह, जाति व्यवस्था जैसे भीषण मान्यता दुनिया में और कहीं भी नहीं देखने को मिलती है।

औपनिवेशिक शासन में केवल भारत में ही उदार लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का चयन किया था। फिर भी इसकी क्षेत्रीय विस्तार, सामाजिक विविधता, जनसंख्या और आर्थिक पिछड़ेपन की व्यापकता ने इसे दूसरे देश लोकतांत्रिक देशों से अलग बना दिया है। पश्चिम के औद्योगिक और आर्थिक उन्नति के बाद एक लंबे समय के बाद महिलाओं तक सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विस्तार हुआ। इससे कितने ही अलग परिस्थितियों में भारत ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक राजनीतिक ढांचा बनाया। अगर आपात काल के 21 महीने को छोड़ भी दिए जाए तो उसमें भी बहुत अच्छे-अच्छे काम हुए हैं और यह इसका एक प्रधान वजह संविधान है। साल 1950 में लागू होने के बाद से ही भारत के संविधान को बहुत प्रशंसा मिली है।  

संविधान लागू होने के इतने सालों बाद आज भारतीय संविधान की व्यवस्था

हर कोई जानता है कि भारतवर्ष का संविधान अच्छा है। लेकिन आज के अयोग्य नेताओं, नौकरशाहों और जजों के कारण इसे सही से लागू नहीं किया जा सका। स्कॉलर माधव खोसला अपनी किताब द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन में लिखते हैं कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों ना हो अगर इस पर अच्छे से काम करने वाले लोग खराब होंगे तो यह खराब होगा लेकिन चाहे संविधान कितना भी खराब क्यों ना हो अगर इस पर काम करने वाले लोग अच्छे होंगे तो यह जरूर अच्छा होगा। लेकिन हम यह कह सकते हैं कि कोई इस बात कीआड़ नहीं ले सकता कि अच्छे इरादों और अंतिम सामाजिक परिणामों के बीच की खाई के लिए संविधान दोषी नहीं है क्योंकि इसका काम समाज के सभी वर्गों को समान आकार देना है।

हमें उम्मीद है कि आप सबको संविधान से जुड़ी यह सब बातें पसंद आई होगी। हम आप लोगों से यह भी अपील करेंगे कि इस देश के नागरिक होने के नाते हम सबको अपने देश के संविधान का सम्मान करना चाहिए। क्योंकि जिस तरह हमारे देश का संविधान विश्व में अलग है ऐसे में हमें हमारे देश के संविधान के सम्मान को आगे भी इसी तरह बनाए रखना जरूरी है। हमें उम्मीद है कि आप लोग इस देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे और अपने देश के संविधान का हमेशा सम्मान करेंगे। अगर आपको हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आई तो इस आर्टिकल को लाइक करें और दूसरों को भी जरूर शेयर करें।

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Jhuma Ray
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