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क्या आप जानते है Natural Farming क्या होता है: जानिए ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग के बारे में।

हाल ही में “मरुस्थलीकरण” पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक समुदाय को बताया कि भारत जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। आज हम जानेंगे “zero budget natural farming” क्या है।

जीरो बजट खेती क्या है

एक बहुत ही मशहूर वैज्ञानिक सुभाष पालेकर के अनुसार पौधों को मिट्टी में मौजूद रहने वाले सूक्ष्म जीवों के जरिए बना बनाया खाना मिलता है। यह सूक्ष्मजीव, पौधों को खाना मुहैया कराने के सबसे अच्छा जरिया होतें है। पालेकर कहते हैं कि देसी नस्ल की गाय का गोबर और मूत्र जीवामृत के लिए सबसे अच्छा है। गाय के गोबर और मूत्र से 30 एकड़ जमीन के लिए जीवामृत तैयार किया जा सकता है। उनके अनुसार रासायनिक खाद और यहां तक की पारंपरिक खाद में भी, मिट्टी में प्राकृतिक तौर पर पाए जाने वाले नाइट्रोजन का इस्तेमाल करते हैं। इससे शुरू में तो उत्पादन बढ़ता है लेकिन जैसे ही नाइट्रोजन का स्तर मिट्टी में कम होता है पैदावार भी घट जाता है।

पिछले कुछ सालों में पूरे देश भर में किसानों के आंदोलन देखने को मिले और किसानों की सबसे बड़ी यही शिकायत है कि खेती की लागते लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन उनकी फसल की सही कीमत नहीं मिलती है क्योंकि रासायनिक खाद कीटनाशक और बीज के साथ खेती में लगने वाले हर एक चीज के दाम में बृद्धि हो रहे हैं।

जीरो बजट फार्मिंग में सभी फसले बिना लागत के ही पैदा किए जा सकते हैं क्योंकि इसके लिए किसान को खेती के लिए बाहर से कुछ भी खरीदना नहीं पड़ता है , पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्व उनके आस-पास ही मिल जाते हैं। हमारे भारत में ही ज्यादातर छोटे-मोटे किसान होते हैं जिनके लिए हाई क्वालिटी के फ़र्टिलाइज़र, पैदावार बढ़ाने वाले दूसरे केमिकल, खाद और महंगे बीज खरीदना संभव नहीं होता है इसी कारण किसान कर्ज में फस जाते हैं जिस कारण वे भुखमरी में आत्महत्या जैसे कदम तक उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। अगर जीरो बजट फार्मिंग से खेती की लागत कम होती है तो यह देश के कृषि सेक्टर के लिए बड़े ही राहत के रूप में साबित होगी।

सुभाष पालेकर कौन है

सुभाष पालेकर एक पूर्व कृषि वैज्ञानिक है। उन्होंने पारंपरिक भारतीय कृषि प्रस्ताव को लेकर कई रिसर्च भी किए हैं और इन रिसर्च की मदद से इन्होंने जीरो बजट प्राकृतिक खेती करने के तरीके पर अध्ययन किया। अध्ययन करने के बाद उन्होंने कई विभिन्न भारतीय भाषाओं में जीरो बजट प्राकृतिक खेती के ऊपर किताबें भी लिखी है। और इन सभी किताबों में जीरो बजट प्राकृतिक खेती से जुड़ी सारी बातों को विस्तार से जानकारी दी गई है। कोई भी किसान इन किताबों की मदद से जीरो बजट प्राकृतिक खेती से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकता है और फसल उगा सकता है।

जानिए जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग क्या है

नेचुरल फार्मिंग जिसका मतलब होता है प्राकृतिक खेती, यह ऐसी खेती होती है जिसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। प्राकृतिक खेती करने वालों का यह कहना है कि यह खेती देसी गाय के गोबर और मूत्र पर आधारित होती है, जिसे जीरो बजट फार्मिंग या जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग कहा जाता है। यह ZBNF जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग शब्द सुभाष पालेकर की ओर से इजाद किया गया है। सुभाष पालेकर के नाम पर इसे SPNF सुभाष पालेकर नेचुरल फार्मिंग भी कहा जाता है। महाराष्ट्र में पद्मश्री सुभाष पालेकर रासायनिक खाद और कीटनाशक के बगैर ही खेती करते हैं। उनका यह मानना है कि रासायनिक और ऑर्गेनिक खेती फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में नाकाम साबित होती है क्योंकि इससे जमीन की उर्वरा क्षमता भी कम हुई है और जल संसाधन भी सिकुड़ गए हैं। साथ ही ग्लोबल वार्मिंग में भी इजाफा हुआ है।

जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग का आधार है जीव – अमृत। दरअसल यह गाय के गोबर, गाय का मूत्र से तैयार होने वाले कीटनाशक का मिश्रण होता है। सुभाष पालेकर का कहना है कि यह पूरी तरह से रासायनिक खाद की जगह ले सकता है। सुभाष पालेकर ने “टाइम्स ऑफ इंडिया” को एक इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने कहा है कि अंगूर की एक ऐसी खेती दिखा सकते हैं जो रसायनिक खाद और कीटनाशक के बिना ही हो रहे हैं। जो अच्छे पैदावार भी दे रहें है उन्होंने कहा कि सूखे के दौरान संतरे के बाग पूरी तरह सूख गए लेकिन SPNF के द्वारा लगाए गए बाग नहीं सुखे।   

जीरो बजट फार्मिंग का उपयोग

जीरो बजट फार्मिंग के पॉपुलरिटी की बात करें तो सुभाष पालेकर ने महाराष्ट्र के बाद जीरो बजट फार्मिंग का बड़ा प्रयोग कर्नाटक में किया और उसके बाद बड़े पैमाने पर आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश के किसानों को खेती करने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए सुभाष पालेकर ने बड़े-बड़े ट्रेनिंग कैंप भी चलाएं। सुभाष पालेकर का दावा है कि अब जीरो बजट फार्मिंग से ज्यादा से ज्यादा किसान जुड़ चुके हैं। केरल और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने भी इस खेती के प्रति अपनी दिलचस्पी दिखाई है तो वहीं उत्तराखंड सरकार ने भी अब इसकी मंजूरी दे दी है। पालेकर का यह मानना है कि धीरे-धीरे दूसरे राज्यों के किसान भी इससे जुड़ेंगे वह कहते हैं कि देश के किसानों का मौजूदा संकट जीरो बजट फार्मिंग से बहुत हद खत्म होने की संभावना है।

रासायनिक खाद के बजाए जीरो बजट खेती पर ही ज्यादातर किसानो जोर दिया हैं। किसानों ने रासायनिक खाद का उपयोग खत्म करके पर्यावरण और सेहत को अच्छा रखने की दिशा में भी कदम बढ़ाया हैं। और अगर इसके लीडर की बात करें तो आंध्र  प्रदेश को इसका लीडर कहा जा सकता है क्योंकि वहां के ज्यादातर किसान इस मिशन से जुड़ चुके हैं जबकि कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और केरल ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। लेकिन अगर बाकी राज्यों की बात करें तो बाकी राज्यो को इस मामले में अभी जीरो के स्थान पर कहा जा सकता है।

इस खेती को बढ़ावा देने के पीछे सरकार का मकसद 

ऐसी खेती को बढ़ावा देने के पीछे मोदी सरकार का यही मकसद है कि किसानों को किसी भी फसल को उगाने के लिए किसी भी तरह का भारी कर्ज ना लेना पड़े। और कर्ज में कर्जदार होकर आत्महत्या जैसे दुखत कदम ना उठाना पड़े। इसके होने से किसान अब कर्ज से मुक्त होंगे, आत्मनिर्भर बनेंगे। तो जहां जीरो बजट खेती में खर्च कम लगेंगे वहीं इससे उत्पादित समान महंगा बिकेगा जिससे इसकी आय बढ़ेगी।

(ZBNF) जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग की तरफ महत्वपूर्ण कदम —

* भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने मोदीपुरम, पंतनगर, लुधियाना और कुरुक्षेत्र में बासमती चावल और गेहूं में जीरो बजट प्राकृतिक खेती का मूल्यांकन करने के लिए एक अध्ययन शुरू किया है।

* हिमाचल प्रदेश में साल 2018 के मई महीने से “प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान” योजना चल रही है।

* तो वहीं कर्नाटक में बागवानी विश्वविद्यालयों के जरिए राज्य के 10 क्षेत्रों के प्रत्येक में 2000 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रायोगिक आधार पर जेडबीएनएफ पर काम शुरू किया गया है।

 * केरल में जेडबीएनएफ के प्रति किसानों में रुचि पैदा करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम, प्रशिक्षण और कार्यशालाए आयोजित की जा रही है।

आइए जानते हैं कि इस बारे में विशेषज्ञ ने क्या कहा

मशहूर कृषि अर्थशास्त्री देवेंदर शर्मा कहते कहा कि कृषि का यह मिशन सही दिशा में जा रहा है और कुछ ही दिनों में लाखों किसानों का इससे जुड़ना एक बहुत बड़ी बात है। इस खेती से किसान आने वाले समय में खुशहाल होंगे और उनको अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे। साथ ही उसका उत्पाद खाने वालों की सेहत भी ठीक रहेगा।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के फायदे

क्या आप जानते है Natural Farming क्या होता है: जानिए ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग के बारे में।

कम लागत और अधिक मुनाफा

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के माध्यम से खेती करने वाले किसानों को किसी भी प्रकार के केमिकल और कीटनाशक तत्वों का खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। केमिकल के बजाए किसान अपने द्वारा बनाई गई चीजों का इस्तेमाल करते हैं जिसके कारण किसानों को खेती में लगने वाले लागत का काफी कम ही लागत लगता है। जैसे इस तरह की खेती में किसान खुद से तैयार की गई खाद का उपयोग किया जाता है। ऐसा करने से किसानों को फसल उगाने में कम खर्च लगते हैं और कम लागत लगने के कारण फसलों पर किसानों को अच्छा खासा मुनाफा मिलता है। 

भविष्य में जमीन की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है

खेती के दौरान खेती से उडगने वाले फसलों में कीड़ा ना लगने के लिए केमिकल और कीटनाशक तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है ताकि फसलों का अच्छे से विकास हो सके लेकिन अगर किसान खेती में केमिकल और कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं तो इसके कारण जमीन की उपजाऊपन का भी नुकसान होता है कुछ समय बाद जमीन के फसलों की पैदावार अच्छे से नहीं हो पाते हैं। लेकिन अगर किसान प्राकृतिक खेती तकनीक का इस्तेमाल करते हैं तो आगे चलकर उनके जमीन की पैदावार काफी अच्छी होती है। यानि की जीरो बजट प्राकृतिक खेती करने से फिलहाल तो फसल अच्छी होगी ही साथ ही ऐसा करने से आगे चलकर भी आपके जमीन के उपजाऊ क्षमता में भी वृद्धि होगी।

भारत में सबसे पहले प्राकृतिक खेती की शुरुआत दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में हुई थी और धीरे-धीरे यह खेती भारत के अन्य राज्यों में भी प्रसिद्ध होने लगी। यानी कि सुभाष पालेकर ने स्टेट फार्मर्स एसोसिएशन कर्नाटक राज्य तैथा संघ (KRRS),और मेंबर ऑफ ला वाया कम्पेसिना (Member Off La Compassina) के साथ मिलकर की थी। उस वक्त कर्नाटक के करीब 1 लाख किसानों ने इस तकनीकी को अपनाया और इस तकनीकी के मदत से खेती किए थे।

आंध्र प्रदेश ऐसा पहला राज्य है जिसने जीरो बजट प्राकृतिक खेती को पूरी तरह से अपनाया है आंध्र प्रदेश के सरकार ने जीरो बजट खेती को साल 2024 तक हर गांव में पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। आंध्र प्रदेश की सरकार ने सबसे पहले साल 2015 में इस तकनीक का इस्तेमाल कुछ गांवो में ही किया था। जिसके बाद इसका प्रयोग करके खेती करने वाले किसानों को काफी ज्यादा फायदा पहुंचा और उसके बाद से ही वहां के सरकार ने इसे बढ़ावा देना शुरू किया। इस समय आंध्र प्रदेश के किसानो की बात करे तो 5 लाख से भी ज्यादा किसान जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत खेती करना शुरू किए हैं।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के दौरान इन तकनीकों का प्रयोग किया जाता है

* जीवामृत 

जीवामृत या जीवनमूर्ति की मदद से जमीन को पोषक तत्व प्राप्त होते हैं और यह एक उत्प्रेरक एजेंट के हिसाब से काम करता है। जिसके वजह से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ती है और फसलों की पैदावार भी अच्छे से अच्छे होती हैं। इसके अलावा जीवामृत की मदद से पेड़ पौधों को कवक, जीवाणु संयंत्र रोग होने से भी बचाया जा सकता है।

* जीवामृत बनाने की विधि

जीवामृत बनाने के लिए सबसे पहले 1 बैरल में 200 लीटर पानी डालने की आवश्यकता होती है। और उसमें 10 किलो गाय का ताजा गोबर डालना होता है, और फिर 5 से 10 लीटर तक वृद्ध गाय का मूत्र डालना पड़ता है, करीब 2 किलो पल्स का आटा, 2 किलो ब्राउन शुगर और साथ में मिट्टी को मिला देना होता है। जब यह सब चीजें मिला देंगे उसके बाद मिलाए हुए मिश्रण को 24 घंटा यानी कि 2 दिनों के लिए छाया में रखें इसके बाद आपका यह मिश्रण इस्तेमाल करने के लिए तैयार हो जाएगा।

* जीवामृत के मिश्रण को प्रयोग करने की विधि

1 एकड़ जमीन के लिए आपको 200 लीटर जीवामृत के मिश्रण की आवश्यकता होती है। उसके अलावा किसानों को महीने भर में दो बार फसलों पर जीवामृत का छिड़काव करना होता है। किसान चाहे तो सिंचाई के पानी में भी इस जीवामृत को मिलाकर फसलों पर छिड़काव कर सकते हैं।

दूसरा होता है बीजामृत या बीजामूर्ति

बीजामृत या बीजामूर्ति को नए पौधों के बीच रोपण में इस्तेमाल किया जाता है।   बीजामृत की मदद से नए पौधों की जड़ों को कवक, मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारी और बीजों की बीमारियों से बचाया जाता है।

* बीजामृत बनाने की विधि

बीजामृत बनाने के लिए गाय के गोबर, एक शक्तिशाली प्राकृतिक कवक नाश, गाए का मूत्र, एंटी-बैक्टीरिया तरल, नींबू और मिट्टी का प्रयोग किया जाता है।

* बीजामृत का उपयोग कैसे करें

किसी भी फसल के बीजों को बोने से पहले उन बीजों में आपको अच्छे से बीजामृत लगाना होता है और यह लगाने के बाद आपको उन बीजों को कुछ देर सूखने के लिए छोड़ देना पड़ता है। इन बीजों पर लगा बीजामृत का मिश्रण जब पूरी तरह सूख जाएंगे उसके बाद आपके बीज बोने के लिए तैयार हो जाते हैं।

 जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग के कुछ प्रमुख बिंदु

  • NAAS 100% रसायन आधारित खेती से बचने का के समर्थन में है तो इसने जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग के दीर्घकालीन प्रभावों को मद्देनजर वैज्ञानिक परीक्षण और ग्रामीण प्रमाणीकरण का सुझाव दिया है।
  • NAAS के अनुसार जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF) पर किए जा रहे वैज्ञानिक परीक्षण उत्पादकता यानी उपज की गुणवत्ता और मृदा पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण करने में सहायक होंगे।
  • NAAS के मुताबिक कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय (Ministry of Agriculture and Farmers Welfare) और नीति आयोग (Niti Aayog) NAAS से इनपुट लिए बिना ही जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF) को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
  • राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकैडमी( National Academy of Agricultural Science-NAAS) ने जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF) के वैज्ञानिक प्रमाण को देखने के बाद देश में खेती के इस पद्धति को बढ़ावा देने का सुझाव दिया है।

अंतिम शब्द

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के माध्यम से फसलें उगाये जाने से केवल किसानों को ही लाभ नहीं होगा अपितु इस देश के नागरिको का स्वास्थ्य भी सही रहेगा साथ ही देश की प्राकृतिक परिवेश भी अच्छी होगी। केमिकल की जगह प्राकृतिक चीजों के इस्तेमाल करके खेती को बेहतर बनाने से के साथ परिवेश बेहतर बन सकेगा, लोगों की सेहत बेहतर बन सकेगी और किसानों के वर्तमान के साथ उनका भविष्य भी उज्जवल हो सकेंगा।

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Jhuma Ray
नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।

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