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मदरसों की तुलना कुम्भ मेला से: कांग्रेस ने उठाये बीजेपी के फैसले पर सवाल।

असम के शिक्षा और वित्त मंत्री का अहम फैसला

एक महत्वपूर्ण विकास की दिशा में, असम के शिक्षा और वित्त मंत्री हिमंत विस्वा सरमा ने घोषणा की है कि राज्य सरकार ने सभी सरकारी मदरसों और संस्कृत टोलों (स्कूलों) को बंद करने का फैसला किया है, क्योंकि असम सरकार के लिए यह संभव नहीं है कि वह धार्मिक शास्त्रों का शिक्षा देने के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग करे।

“हमारी सरकार की नीति हमने राज्य विधानसभा में पहले ही घोषित कर दी थी। सरकार के वित्त पोषण के साथ कोई धार्मिक शिक्षा नहीं होनी चाहिए,” उन्होंने मीडिया को बताया।सरमा के अनुसार, इस संबंध में एक औपचारिक अधिसूचना राज्य सरकार द्वारा नवंबर में जारी की जाएगी।सरमा ने कहा कि मदरसों को बंद करने के बाद शिक्षा विभाग के तहत 48 संविदा शिक्षकों को स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के प्रमुख और इत्र व्यवसायी बदरुद्दीन अजमल ने राज्य सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि अगर सरकार द्वारा संचालित मदरसों को बंद करने का फैसला किया जाता है, तो उनकी पार्टी, 2021 विधानसभा चुनाव में सत्ता में आने के बाद इन शैक्षणिक संस्थाओं को फिर से खोलने के लिए कदम उठाएगी।

“अजमल ने कहा कि मदरसों को बंद बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता है। हम इन 50-60 वर्षीय मदरसों को फिर से खोलेंगे, अगर यह भाजपा सरकार उन्हें जबरन बंद कर देती है।” अजमल ने कहा, जो की एक सांसद भी हैं।

विशेष रूप से, असम में 614 सरकारी सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त मदरसे हैं – लड़कियों के लिए 57, लड़कों के लिए तीन और 554 सह-शैक्षिक। उर्दू माध्यम में कुल 17 मदरसे छात्रों को पढ़ाते हैं। असम भर में लगभग 1,000 संस्कृत की टोले हैं, जिनमें से लगभग 100 सरकारी सहायता प्राप्त हैं।

असम सरकार मदरसों पर लगभग 3-4 करोड़ रुपये और संस्कृत टोलों पर लगभग 1 करोड़ रुपये सालाना खर्च करती है।

कॉंग्रेस की प्रतिक्रिया

असम के शिक्षा मंत्री तथा वित्त मंत्री हिमंत विस्वा सरमा के इस फैसले ने अलग-अलग पार्टियों के बीच दुश्मनी की आग को और ज्यादा भड़का दिया है। शर्मा के इस फैसले से क्रोधित होकर कांग्रेस पार्टी ने खुलकर अपनी भड़ास निकाली है, जिसने कांग्रेस और बीजेपी के बीच की दुश्मनी की दीवार को और ज्यादा तगड़ा कर दिया है।

असम के शिक्षा मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि मदरसों में मुस्लिम धार्मिक पुस्तक कुरान पढ़ाने के लिए सरकारी धन का उपयोग नहीं किया जा सकता है। इसी फैसले पर कांग्रेस नेता उदित राज ने गुरुवार को कहा कि सरकार को कुंभ मेले के आयोजन में 4,200 करोड़ रुपये खर्च नहीं करने चाहिए। पूर्व लोकसभा सांसद ने कहा कि सरकार को किसी भी धार्मिक उपदेश और अनुष्ठान के लिए धन नहीं देना चाहिए क्योंकि राज्य का अपना धर्म नहीं होता है।

“सरकार द्वारा वित्त पोषित होने के लिए कोई धार्मिक शिक्षा और अनुष्ठान नहीं। अगर राज्य का अपना धर्म नहीं होता है, यूपी सरकार ने इलाहाबाद में कुंभ मेले के आयोजन में 4200 करोड़ रुपये खर्च किए और यह भी गलत था, ”उदित राज ने टिप्पणी की।

सरमा ने मंगलवार (13 अक्टूबर) को कहा था कि राज्य सरकार नवंबर से सरकारी खजाने की कीमत पर कुरान पढ़ाना बंद कर देगी। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर सरकार मदरसों में कुरान पढ़ाने का खर्च वहन कर रही है, तो उसे बाइबल और भगवद गीता के शिक्षण का भी भुगतान करना चाहिए।

बीजेपी ने उदित राज के बयान के लिए उनकी जमकर खिंचाई की।केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा, “कुछ लोगों के पास विकास के लिए विचार और इच्छा नहीं है। जब करोड़ों लोग किसी कार्यक्रम में शामिल होते हैं, तो सरकार को बुनियादी ढांचा विकसित करना और सुविधाएं प्रदान करना होता है। इस तरह के आयोजन से बुनियादी ढांचे के विकास के अवसर मिलते हैं।”

उत्तर प्रदेश के मंत्री बृजेश पाठक ने कहा, “कुंभ एक वैश्विक मामला है, यह सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार तक सीमित नहीं है। किसी को ऐसे आयोजन पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, जिसमें लाखों लोग शामिल हों।”

भाजपा के गौरव भाटिया ने कांग्रेस पर पलटवार किया

भाजपा के वरिष्ठ सलाहकार गौरव भाटिया ने गुरुवार को यानी कल कांग्रेस पर पलटवार किया, जिसने उत्तर प्रदेश में कुंभ मेले के आयोजन पर ‘अत्यधिक’ खर्च पर सवाल उठाया है और योगी आदित्यनाथ सरकार पर राज्य में हिंदू धर्म का प्रचार करने का आरोप लगाया है। असम सरकार के सभी सरकारी मदरसों और लगभग 100 संस्कृत टोलों को बंद करने के फैसले का बचाव करते हुए, गौरव भाटिया ने कहा कि अगर करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल धार्मिक शिक्षा देने वाले स्कूलों को  चलाने के लिए किया जाता है तो यह अनुचित है।

राज्य सरकार द्वारा इस्लामिक मदरसों को बंद करने के असम सरकार के फैसले से तुलना करते हुए, कांग्रेस ने कहा है कि कुंभ मेला हिंदू धर्म का प्रचार करता है और सरकार को धार्मिक आयोजन करने के लिए 4,200 करोड़ रुपये का आवंटन बंद करना चाहिए। 

विपक्ष की कड़ी प्रतिक्रिया में, भाजपा के गौरव भाटिया ने कहा कि असम सरकार तुष्टिकरण की राजनीति को सही कर रही है, जो राज्य में दशकों से चली आ रही है। भाजपा सरकार के फैसले का समर्थन करते हुए, उन्होंने पूछा कि मदरसों में करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल क्यों किया जाना चाहिए, जहां धार्मिक शिक्षाएं प्रदान की जाती हैं।

इसी तरह, उनके साथी- एसएन सिंह ने कसम खाई कि अगला कुंभ मेला “2019 की तुलना में’ और ज्यादा शानदार होगा और ‘इस पर दोगुनी राशि खर्च की जाएगी।”

हिंदू से नफरत करने वाली कांग्रेस

बीजेपी नेता ने कांग्रेस पर, यूपी के इलाहाबाद में हर छह साल में आयोजित होने वाले कुंभ मेले का विरोध करने के लिए ‘हिंदू नफरत’ होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मदरसों को बंद करने के लिए कुंभ मेले की तुलना करके एक कृत्रिम समानता बनाने की कोशिश कर रही है।

बीजेपी हमेशा से यह दावा करती आ रही है कि वह धर्म, जाती को किनारे रखकर जनता की सेवा करती है और राजनीति और धर्म को कभी भी एक साथ मिक्स नहीं करती लेकिन कांग्रेस ने हमेशा से ही बीजेपी पर मुस्लिम और इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगाया है। हमेशा से ही कांग्रेस की तरफ से इस तरह के बयान सामने आते रहे हैं जिससे बीजेपी को मुस्लिम विरोधी कहकर कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया जाता है। लेकिन हाल ही में जैसी परिस्थिति उत्पन्न हुई है, कांग्रेस का गुस्सा जिस तरह से बीजेपी पर भड़का है और जिस तरह से कांग्रेस ने मदरसों की तुलना कुंभ मेले से कर दी है, उससे तो यही निष्कर्ष निकलकर सामने आ रहा है कि कांग्रेस ही पूरी तरह से हिंदू विरोधी प्रतिक्रिया अपनाए हुए हैं।

 जबकि बीजेपी ने तो यह साफ तौर पर कह दिया है कि उसको किसी भी धर्म से कोई मतलब नहीं सरकार बस यह चाहती है कि सार्वजनिक धन का सही उपयोग हो और इस धन का उपयोग किसी भी धर्म के हित में नहीं बल्कि बल्कि राज्य और देश के हित में हो। बीजेपी सरकार यह नहीं कह रही कि मुस्लिम बच्चों को पढ़ना नहीं चाहिए अपितु सरकार तो बस यह कह रही है कि मुस्लिम स्टूडेंट्स भी उसी पाठशाला में, उसी स्कूल में पढ़ने जाए जिसमें हिंदू और बाकी धर्म के स्टूडेंट्स आते हैं और अपनी शिक्षा का उपयोग राज्य देश और अपने समाज की उन्नति के लिए करें, ना कि मद्राशा जैसे स्कूल में धार्मिक शिक्षा लेकर अपनी ही अलग समाज बनाए।

 क्योंकि यह हिंदुस्तान के नीति के अंदर नहीं आते। हिंदुस्तान में हर धर्म के हर आदमी को बराबर अधिकार के साथ जीने का हक है और बराबर सम्मान पाने का हक है। अगर मुसलमान छात्रों को कुरान की शिक्षा लेनी है तो वह घर पर या फिर किसी प्राइवेट संस्था में ले सकते हैं। लेकिन सरकार ऐसे स्कूलों में अब पैसे खर्च नहीं करेगी और कांग्रेस के लाख चिल्लाने से भी सरकार का यह फैसला नहीं बदलेगा और ना ही बदलना चाहिए। क्योंकि यही सही है और यही देश की उन्नति के लिए जरूरी भी है।

निष्कर्ष:-
 आपको क्या लगता है असम सरकार का यह फैसला उचित है और हिमंत बिस्वा सरमा के फैसले पर कांग्रेस ने जिस तरह से प्रतिक्रिया दी वह क्या वाकई में सही था। हर धर्म को हिंदुस्तान में बराबरी का अधिकार मिला हुआ है, ऐसे में किसी विशेष धर्म का झंडा लहराना कहीं से भी उचित नहीं है और असम सरकार ने भी इस फैसले के जरिए धर्मनिरपेक्षता पर जोर दिया है। इस विषय में आपकी क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बताएं और इस आर्टिकल को अधिक से अधिक शेयर करने के साथ इस पोस्ट को एक लाइक भी करें। अगर आपको हमसे कोई सवाल करना हो तो हमें कमेंट करके पूछ सकते हैं।

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Jhuma Ray
नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।

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