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चलो इतिहास में चले, आजादी के साथ जुड़ी कुछ खास बातें: लोग तो सिर्फ गलत समझते हैं, सच्चाई कोई नहीं समझना चाहता।

महात्मा गांधी! कुछ याद आया आप लोगों को। इस नाम को सुनने से ही हमारे जहन में सिर्फ एक ही शब्द आता है और वह है आजादी, हमारे देश की आजादी। गुलामी की जिंदगी कितना कष्टदाई होता है, यह केवल वही लोग समझ सकते हैं जिन्होंने गुलामी की जिंदगी जी हो। हमने तो जन्म ही आजाद भारत में लिया लेकिन उन लोगों का क्या जिन्होंने  अंग्रेजों की गुलामी करते करते अपनी जिंदगी निकाल दी। अगर इतिहास के उस समय में बापू हमारे देश में ना होते तो शायद यह देश कभी आजाद नहीं होता। बापू ने हमें आजादी दिलवाई, हमें अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त किया।

लेकिन आजादी के 70 साल बाद भी जब भी 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्टूबर, जैसे कोई डे आता है तो अक्सर  बापु को लेकर कई सवाल उठ खड़े होते हैं। खास करके आजादि के कुछ सालों पहले से लेकर बापू की मौत तक जितनी भी घटनाएं घटी, उन घटनाओं ने बापू को सवाल के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। यहां तक कि बापू के मरने के बाद भी बहुत सारी ऐसी घटनाएं घटी जिसके लिए बापू की आलोचना भी हुई। समाज के एक वर्ग के अनुसार गांधी बापू भगवान से कम नहीं, वही समाज का दूसरा वर्ग उनको पक्षपाती फरेबी और न जाने किस किस नाम से संबोधित करता रहा है। आज के लेख में हम कुछ ऐसे बिंदुओं को उजागर करेंगे, जिसे पढ़ने के बाद आपके सामने कुछ नए पहलू आएंगे। ना सिर्फ बापू से जुड़े बल्कि आजादी आंदोलन में जितने भी सेनानी थे उनके साथ साथ देश  की आजादी सेे जुड़े भी कुछ नए पहलू उजागर होंगे। सबसे पहले चलिए अहिंसा से इसकी शुरुआत करते हैं जो आजादी की लड़ाई में बापू का सबसे अहम हथियार था।

अहिंसा — बापू के हथियार

अहिंसा, यह दो शब्द एक दूसरे के साथ ऐसे जुड़े हुए हैं कि एक का नाम लो तो दूसरा याद आ जाता है। बापू ने आजादी दिलवाने के लिए जिस हथियार का इस्तेमाल किया, वह था अहिंसा। अहिंसा के दम पर बापू ने पूरे देश को आजादी दिलाई, जिसके चलते वह पूरे देश के लिए पूजनीय हो गए। हिंसा उन्हें पसंद नहीं था और ना ही वह लड़ाई झगड़े में यकीन रखते थे। उन्होंने अहिंसा से ही अंग्रेजों को भारत से खदेड़ा और अगली पीढ़ी के सफर को आसान किया। उस समय जितने भी लोग आजादी के लिए लड़ाई लड़ रहे थे उनमें कुछ कट्टरपंथी भी थे। आपको याद होगा सन 1907 में आंदोलनकारी दो दलों में विभाजित हो गए थे। शायद यही वजह है कि बापू आज पूरी दुनिया के लिए पूजनीय है। इसी वजह से शायद बापू से लोग ज्यादा ही अपेक्षा करने लगे थे। महात्मा गांधी ने अहिंसा का पथ चुना था इसी कारण लोग यह उम्मीद लगा बैठे की महात्मा गांधी कुछ गलत कर ही नहीं सकते और अगर गलती से भी बापू से कोई गलती हो जाए तो लोग उसके लिए उनकी उपेक्षा करने लगते थे। लेकिन महात्मा गांधी कोई भगवान नहीं थे। थे तो वो भी आखिर एक इंसान ही और इंसान से गलती होना लाजमी है। 

यहां एक बात और गौर करने वाली है। आजादी मिलने तक तो सब कुछ ठीक था लेकिन आजादी के बाद से ही राजनीतिक खेल शुरू हो गया था। जैसे ही देश आजाद हुआ लोगों के बीच की एकता कहीं ना कहीं खत्म होते जा रही थी। आज भी लोग महात्मा गांधी को अपने स्वार्थ का जरिया बनाने से पीछे नहीं हटते। क्योंकि वह एक महान व्यक्ति थे लोगों को लगता कि अगर बापू का नाम इस्तेमाल करेंगे तो उनकी प्रगति होगी। 

गांधी शब्द के पीछे का राज

हम सभी जानते हैं इंदिरा गांधी जवाहरलाल नेहरू की पुत्री थी और उन्होंने फिरोज गांधी से विवाह किया था। उसके बाद उनके परिवार में जितने भी सदस्य हुए सबका उपनाम गांधी पड़ गया। अब कांग्रेस पार्टी क्योंकि पावर में नहीं है और पार्टी की छवि भी खराब हो चुकी है, लोगों के मन में यह सवाल भी आ रहा है कि उनके नाम के आगे गांधी लगाने के पीछे भी कोई राजनीतिक उद्देश्य तो नहीं था। आखिर कौन थे यह फिरोज गांधी। इनके बारे में किसी को ज्यादा जानकारी नहीं है। जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी के अच्छे मित्र और आंदोलन के एक प्रमुख सदस्य थे। जब देश आजाद हुआ उसके बाद जवाहरलाल नेहरू को ही देश का प्रथम प्रधानमंत्री बनाया गया। इस तरह जवाहरलाल नेहरू देश की परिस्थिति से अच्छी तरह से वाकिफ थे और महात्मा गांधी की जनप्रियता से भी परिचित थे। उसके बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी का फिरोज गांधी से शादी होना और उनका प्रधानमंत्री बनना, परिवार के हर सदस्य के नाम के आगे गांधी लगाना, आजादी के बाद से ही कॉंग्रेस का शासन चलना, लोगों के मन में लाखों सवाल खड़े कर देते हैं।

चलो इतिहास में चले, आजादी के साथ जुड़ी कुछ खास बातें: लोग तो सिर्फ गलत समझते हैं, सच्चाई कोई नहीं समझना चाहता।

बापू के ऊपर सवाल

महात्मा गांधी का हत्या भी अक्सर समाज में सवाल खड़े कर देता है। उनकी हत्या नाथूराम गोडसे द्वारा की गई थी और उनके हत्या के पीछे बहुत सारी वजह सामने आई। लेकिन नाथूराम गोडसे, जिसने बापू की हत्या की उसके अनुसार महात्मा गांधी को मुसलमानों की हित के लिए अधिक आग्रही समझकर गोडसे ने उनकी हत्या की। जब नाथूराम गोडसे की पेशी कोर्ट में हुई तो उन्होंने अपने बयान में कहा था कि महात्मा गांधी मुसलमानों के हित के लिए ज्यादा आग्रही थे और भारत विभाजन में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी द्वारा की गई उस भूख हड़ताल का भी जिक्र किया, जो बापू ने मुसलमानों के लिए किया था। जब भारत ने पाकिस्तान के लिए फंड जारी करने से मना कर दिया था महात्मा गांधी ने भूख हड़ताल किया था और भारत से अपनी बात मनवायी थी। 
लेकिन वक्त के साथ-साथ नाथूराम गोडसे के वह बयान धुंधले हो गए और लोग उन्हें भूल भी गए। देशवासी बापू को जानते हैं और उन्हें पता है कि बापू के लिए अहिंसा से बढ़कर कुछ भी नहीं था। वह धर्मनिरपेक्ष थे, उन्होंने कभी भी जाति हिंसा को बढ़ावा देने में यकीन नहीं रखा। इसीलिए जब उनको लगा कि अब हिंदू मुसलमान एक साथ एक देश में नहीं रह सकते तो उन्होंने विभाजन का समर्थन किया। अब नाथूराम गोडसे ने इस बात को गलत तरीके से लिया उसमें बापू की कोई गलती नहीं थी। लोग तो यह भी कहते हैं कि बापू के हत्या के पीछे नाथूराम गोडसे का व्यक्तिगत स्वार्थ भी छिपा था। हालाकि नाथूराम गोडसे ने खुद से कभी इस बात को स्वीकार नहीं किया। उसने हमेशा यही बताया कि गांधीजी की हत्या उसने सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक उद्देश्य से किया। उसका व्यक्तिगत तौर पर इस में कोई स्वार्थ नहीं था।

महात्मा गांधी — एक नायक की परिभाषा

आज इतने सालों बाद जब लोग आजादी की सांस ले रहे हैं तो लोगो को यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि बापू ने देश को आजाद कराया। हां हम यह नहीं कह सकते कि सिर्फ बापू ने ही देश को आजाद कराया, अगर बापू के साथ तमाम साहसी वीर योद्धा नहीं होते तो बापु के अकेले का बस का कुछ नहीं था लेकिन हम यह जरूर कह सकते हैं कि अगर बापु अकेले नहीं होते तो भी देश को आजादी दिलाना संभव नहीं था।

बापू ने भले ही देश को अकेले आजादी ना दिलवाई हो लेकिन बापू अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने आंदोलन को एक नई दिशा दी, नई राह दिखाई और नया मंत्र दिया। बापू के जुड़ने से पहले ही आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी। जब दक्षिण अफ्रीका में बापू ने भेदभाव को मिटाने का संकल्प किया और वे भारत आए तब उन्होंने भारत की परिस्थिति को देखते हुए अमदोलनकारियों को एक नई राह दिखाई। उन्होंने आंदोलनकारियों को उस समय पर सहारा दिया जब जीत की आशा ना के बराबर थी। उनके नेतृत्व में आंदोलन और आंदोलनकारियों में नई ऊर्जा का संचार हुआ और आखरी में जीत की प्राप्ति हुई। हालांकि बीच में मतभेद के चलते थोड़ी अराजकता आ गई थी लेकिन सारा खेल यहा पर विचारों का था। सभी का उद्देश्य तो एक ही था लेकिन उनके सोचने का तरीका अलग था। 

महात्मा गांधी ने अपने विचारों से कभी भी समझौता नहीं किया क्योंकि उनको अपने विचारों पर विश्वास था और अंत तक उन्होंने अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ा। कहीं ना कहीं उनकी अहिंसा नीति ही उनकी दुश्मन बन गयी और उनकी हत्या हो गई। लोगों ने उन्हें गलत समझा बापू हिंदू जाति के थे और लोग उनसे यह उम्मीद कर रहे थे कि वे सिर्फ और सिर्फ हिन्दू जाति के हित में सोचे, उन्हीं के लिए बस काम करें। लेकिन उनका नजरिया धर्मनिरपेक्ष था। वह हर धर्म को बराबर दर्जा देने के पक्ष में थे और इसी वजह से उन्होंने अपने लाखों हिंदू दुश्मन पैदा कर लिए। आज भी कुछ कट्टरपंथी लोग बापू को गलत समझते हैं लेकिन उनके सोचने से यह सच्चाई नहीं बदल जाएगी कि बापू हमारे देश के वह हीरो थे जिनके बिना कहानी पूरी नहीं हो सकती थी।

खुद विचार करें

लेकिन यहा मैं एक और बात कहना चाहूंगी। हम इंसानों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि हम सिर्फ और सिर्फ इमारत को ही देखते हैं और उसी की प्रशंसा करते हैं लेकिन इमारत की नींव को हम भूल ही जाते हैं जिस नींव पर वह इमारत खड़ी है। मानव समाज की यही कमजोरी है। हम लाल बहादुर शास्त्री का ही उदाहरण देते हैं। आप लोगों में से कितनों को यह पता है कि आज लाल बहादुर शास्त्री का भी जयंती है। हम बचपन से ही 2 अक्टूबर को गांधी जयंती है यह सुनते आ रहे हैं। सुनते सुनते हमें मुंह जबानी भी याद हो गया है। लोग एक दूसरे को गांधी जयंती विश करते हैं। लेकिन कौन लाल बहादुर शास्त्री जयंती विश करता है। जिस तरह बापू ने हमारे देश को अपना सब कुछ दिया ठीक उसी तरह लाल बहादुर शास्त्री ने भी अपना योगदान दिया। ना सिर्फ आजादी की लड़ाई में बल्कि आजादी के बाद भी लाल बहादुर शास्त्री ने हमारे देश के लिए सब कुछ किया। किसानों को उनका हक दिलाने से लेकर देश का प्रधानमंत्री बनने तक देश की भलाई के लिए कदम कदम पर अपना योगदान दिया। 
इस तरह से एक और बात सामने आती है कि आजादी के आंदोलन में लाखों सेनानी थे, लाखों ने अपना सब कुछ कुर्बान किया लेकिन आज कितनों को उन सभी के नाम याद है। आजादी और महात्मा गांधी इन दोनों शब्दों को हमने जोड़ दिया लेकिन आजादी के साथ लाल बहादुर शास्त्री, सरदार वल्लभ भाई पटेल के और बाकी आंदोलनकारियों का नाम जोड़ना तो हम भूल ही गए। हम जानने की कोशिश भी नहीं करते कि बीते समय में उन लोगों ने कितना बलिदान दिया है। अगर किताबों में कभी-कभार मिल भी जाता है तो हम थोड़ा बहुत पढ़ कर टाल देते हैं। लेकिन इनके बलिदान को उचित सम्मान मिलना क्या महत्वपूर्ण नहीं है। 

दांडी मार्च आंदोलन, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन इत्यादि को ही ले लीजिए। इनमें से कौन सा आंदोलन ऐसा है जिसमें लाल बहादुर शास्त्री ने भूमिका नहीं निभाई। जय जवान जय किसान का नारा उन्होंने दिया। लाल बहादुर शास्त्री एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने पूरा जीवन गरीबों के लिए और गरीबी को मिटाने के लिए समर्पित किया। लाल बहादुर शास्त्री कहते थे, अगर हमें आजादी चाहिए तो हमें आपस में नहीं लड़कर गरीबी, भुखमरी और दरिद्रता से लड़ना चाहिए। लेकिन फिर भी लोग सिर्फ महात्मा गांधी को ही याद करते हैं, पूजते हैं। 
निष्कर्ष

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि आजादी के लिए आंदोलनकारियों ने जिस जुनून से अपना सर्वस्व कुर्बान किया उसके लिए अदम्य साहस और शक्ति की जरूरत थी, जो आज की पीढ़ी में शायद ही बचा है। वैसे महान लोगों के बारे में याद रखना, उनकी जीवनी पढ़ना, उनके कहे गए महान कथनों को पढ़ना समाज में एक नई रोशनी फैलाने के लिए आवश्यक है। आज हम जिस देश में आजादी का सांस ले रहे हैं उसकी वजह वह महान नेता हैं। लेकिन मानव समाज का स्वभाव है, हम एक ही पल में लोगों को भगवान बना लेते हैं और उनसे हजारों उम्मीदें जोरने लगते हैं। फिर उस व्यक्ति से जरा सी गलती हुई नहीं कि हम उनको अपनी नजरों से गिरा देते हैं। जैसे वह इंसान बनने के लायक भी ना हो। 

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Jhuma Ray
नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।

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