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अधिक मास 2020: जानिए अधिकमास क्या होता है, इसका महत्व और इस मास से जुड़ी पौराणिक कथा।

17 सितंबर को श्राद्ध खत्म होने के बाद 18 सितंबर से अधिकमास शुरू हो जाएगा और 16 अक्टूबर को अधिक मास खत्म होगा। उसके बाद 17 अक्टूबर से नवरात्रि मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल 2020 में आश्विन के महीने में अधिक मास पड़ा है। अधिक मास के बारे में काफी लोगो को पता होता है लेकिन कुछ लोगो को इसके बारे में पता नही होता। तो अगर आपको भी अधिक मास के बारे में ज्यादा जानकारी चाहिए तो इस पोस्ट को ध्यान से और पूरा पढ़िये।

अधिक मास क्या होता है

इस वर्ष आश्विन के महीने में अधिक मास पड़ रहा है। जिस महीने में सूर्य संक्रांति नहीं होती है, वही महीना अधिक मास कहलाता है। अधिक मास 32 महीने 16 दिन और 4 घंटे के अंतर से आता है। 12 महीने में वरुण, भानु, सूर्य, तपन, रवि, चण्ड, गभस्थी, हिरण्यरेता, अर्यमा, दिवाकर, मित्र और विष्णु 12 मित्र होते हैं। अधिक मास इनसे अलग होता हैं और इसी कारण इसे मलिम्लुच मास भी कहा जाता है। ऐसे में लोगों के मन में काफी प्रश्न होते हैं कि, इन दिनों उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। अधिक मास में कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जिसे फलप्राप्ति की कामना से किए जाना वर्जित माना गया है। वहीं अगर फल की आशा के बिना कोई काम किया जाये, तो वह कार्य इस मास में निश्चित रूप से किया जा सकता है।

अधिक मास का महत्व

यह माना जाता है कि प्रत्येक जीव पंचमहाभूत से मिलकर बना है और इन पंचमहाभूतो में जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश सम्मिलित है। अपनी प्रकृति के अनुरूप ही पांचों तत्व प्रत्येक जीव की प्रकृति निश्चित करते हैं। अधिक मास के समय में समस्त धार्मिक कृत्यों जैसे चिंतन, मनन, योग, ध्यान इत्यादि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित इन पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयत्न करता है। इस पूरे मास में व्यक्ति अपने धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयासों से अपने आप को भौतिक और आध्यात्मिक कार्यो के लिए निर्मल करता है। इस तरह अधिक मास के दौरान किए गए प्रयासों से कोई भी व्यक्ति हर 3 साल में अपने आप को हर तरह से स्वच्छ व साफ करके परम निर्मलता को प्राप्त करता है और नई ऊर्जा से भर जाता है। .यह माना जाता है कि इस दौरान किए गए प्रयासों से समस्त कुंडली दोषों का भी निवारण होता है।

अधिक मास की पौराणिक कथा

अधिक मास के लिए पुराणों में एक सुंदर कथा है। अधिक मास की कथा दैत्य राज हिरण्यकश्यप के वध से जुड़ी हुई है। पुराणों के अनुसार, दैत्य राज हिरण्यकश्यप ने एक बार कठोर तप किया और तप करके भगवान ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। भगवान ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उन्होंने ब्रह्मा जी से अमरता यानी कि अपने आप को हमेशा के लिए अमर होने का वरदान मांग लिया। लेकिन ब्रह्मा जी ने उन्हें कहा कि वे कोई दूसरा वरदान मांगे। तब हिरण्यकश्यप ने वर मांगते हुए कहा कि, भगवान उसे ऐसा वर दें कि उसे संसार में नर, नारी, देवता या कोई भी ना मार सके। साल के 12 महीनों में उसे कभी भी मृत्यु प्राप्त ना हो। उसने बड़े ही छल से कहा कि जब वह मरे तो ना ही वह दिन हो और ना ही रात हो। ना ही किसी अस्त्र शास्त्र से मार सके , ना ही घर में मार सके और ना घर के बाहर मार सके। इस वरदान के मिलने से हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर सोचने लगा और उसने खुद को भगवान सोच लिया। अहंकार के बस में आकर वह बहुत पाप करने लगा। जैसा कि हिरण्यकश्यप ने वरदान मांगा था कि 12 महीने में कभी भी उसे मृत्यु की प्राप्ति ना हो और ना ही कोई किसी अस्त्र-शस्त्र से उसे मार सके। इसीलिए समय आने पर भगवान विष्णु ने अधिक मास में नरसिंह का अवतार लेकर यानी कि आधा पुरुष और आधा शेर के रूप में प्रकट होकर शाम के समय में डेहरी के नीचे बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीर कर उसे मृत्यु दी।

क्यों आता है अधिकमास

सूर्य साल 365 दिन 6 घंटे का होता है, वही चंद्र वर्ष 354 दिन का होता है और दोनों सालों के बीच करीब 11 दिनों का अंतर होता है। यह अंतर हर 3 साल में करीब 1 महीने के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए 3 साल में एक चंद्रमास अतिरिक्त आ जाता है और इसी कारण अतिरिक्त होने की वजह से इस मास को अधिकमास का नाम दिया गया है। हिंदू शास्त्रों में अधिक मास को बहुत ज्यादा पवित्र माना जाता है। इसीलिए अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। पुरुषोत्तम मास यानी कि भगवान पुरुषोत्तम का मास या महीना। शास्त्रों के अनुसार अधिक मास के अवसर में व्रत पालन करना, पवित्र नदियों में नहाना और तीर्थ स्थानों की यात्रा करने से बहुत पुण्य प्राप्त होता है।

अधिकमास के अन्य नाम

अधिकमास के कई अन्य नाम भी है। इस माह को कुछ जगहों पर मलमास के नाम से भी जाना जाता है और इस महीने को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। पुरानी कथाओं के अनुसार माना जाता है कि, मलमास होने के कारण कोई भी देवता इस माह में पूजा करवाना नहीं चाहते थे। इस महीने के देवता कोई भी देवता नहीं बनना चाहते थे। तब मलमास ने स्वयं भगवान विष्णु से निवेदन किया था और तब भगवान विष्णु ने अधिकमास को अपना नाम पुरुषोत्तम दे दिया। तभी से इस माह का नाम पुरुषोत्तम पर गया। अधिक मास को मलिम्लुच के नाम से भी जाना जाता है। 12 महीने में वरुण, भानु, सूर्य, तपन, रवि, चण्ड, गभस्थी, हिरण्यरेता, अर्यमा, दिवाकर, मित्र और विष्णु 12 मित्र होते हैं और अधिक मास इनसे अलग होते हैं और इसी कारण इसे मलिम्लुच मास कहा जाता है।

Jhuma Ray
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