Thursday, May 19, 2022
Homeहिन्दीजानकारीAll About गुरु पूर्णिमा

All About गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा जिसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, आषाढ़ माह में आती है और इस वर्ष 5 जुलाई को मनाई जाएगी। इस दिन, छात्र अपने गुरुओं का सम्मान करते हैं और यह वेद व्यास की जयंती पर मनाया जाता है। आषाढ़ महीने की पूर्णिमा का दिन एक ऐसा दिन होता है जो हिन्दू धर्म के लिए बहुत पवित्र होता है। विशेष रूप से इसलिए यह दिन खास होता है, क्योंकि यह दिन, महान भारतीय ऋषि व्यास की पूजा करने का दिन है। वह एक भारतीय संत थे, जिन्हें चारों भारतीय वेदों का संपादन करने और 18 हिंदू पुराणों को लिखने के साथ-साथ पवित्र श्रीमद्भागवत और महाभारत की कहानी लिखने का श्रेय दिया जाता है। कहा जाता है कि गुरु दत्तात्रेय के गुरु को ऋषि
व्यास ने पढ़ाया था। इस दिन को सभी हिंदुओं के लिए एक बहुत ही ज्ञान-उन्मुख दिन माना जाता है।

इस बार गुरु पूर्णिमा की तिथि इस प्रकार है

गुरुपूर्णिमा तिथि पूर्णिमा तिथि 4 जुलाई को सुबह 11:33 बजे से शुरू होगी और पूर्णिमा तिथि का समापन प्रातः 10:13 बजे 5 जुलाई को होगा।

गुरुप्रेम के उदाहरण


हम सभी के मन में अपने अपने गुरु के लिए ढेर सारा स्नेह और सम्मान होता है। लेकिन हमारे इतिहास में कुछ ऐसे महान चरित्र शामिल है, जिनका अपने गुरु के लिए प्रेम इस दुनिया से परे था और वो अपने गुरु के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटे। वे अपने गुरु के मन की बात बिना बोले समझते थे और यह भी जानते थे कि उनके गुरु उनसे क्या आशा रखते हैं। हमें इन महान व्यक्तियों से प्रेरित होना चाहिए और उनसे यह सीख लेना चाहिए कि हमारे गुरु भगवान से कम नहीं है और हमें उनका उचित सम्मान करना चाहिए। “यही हमारा धर्म है और यही
कर्तव्य!” 


इतिहास के गौरव कुछ शिष्य

1.एकलव्य


एकलव्य महाभारत काल एक चरित्र है। वो राजा हिरण्यधनु नाम के एक निषाद का पुत्र था। तीर चलाने का तीव्र जुनून एकलव्य पर सवार था और द्रोणाचार्य से तीरंदाजी सीखना चाहता था। लेकिन गुरु द्रोणाचार्य ने एक निषाद पुत्र होने के कारण एकलव्य को अपना शिष्य बनाने से इनकार कर दिया। इस बात से क्रोधित न होकर एकलव्य ने मिट्टी से द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाई और उसे अपना गुरु माना। उन्होंने खुद को तीरंदाजी की कला में प्रशिक्षित किया और अपने निरंतर अभ्यास और भक्ति के कारण, एकलव्य ने तीरंदाजी के कौशल में द्रोणाचार्य के पसंदीदा शिष्य अर्जुन को पीछे
छोड़ दिया। उसके बाद जब द्रोणाचार्य ने अपने गुरु दक्षिणा के लिए कहा, तो एकलव्य ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना दाहिना अंगूठा काटकर उनको दे दिया।

2. अर्जुन


गुरु द्रोणाचार्य का एक और प्रिय शिष्य था महाभारत काल के नायक पांडवों में से एक अर्जुन। तीरंदाजी के प्रति उनकी निष्ठा और लगन की वजह से ही वो गुरु द्रोणाचार्य के सबसे प्रिय शिष्यों में से एक थे। गुरुकुल में अध्ययन के दौरान, द्रोणाचार्य ने अपने प्रत्येक छात्र से पूछा कि वे पास के पेड़ पर क्या देख सकते हैं। जवाब में कुछ ने कहा कि पत्ते और फल। लेकिन अर्जुन ने कहा कि वह केवल पेड़ की शाखा पर बैठे पक्षी की आंख देख सकता है। यह कहानी बताती है कि अर्जुन बचपन से ही कितना केंद्रित था, और इस तरह द्रोणाचार्य का पसंदीदा था।

3.सूरदास


क्रोध पर काबू पाने और आध्यात्मिक रूप से उन्नति में मदद करने के लिए, सूरदास के गुरु ने, उन्हें एक महीने के लिए भगवान के नाम का जाप करने को कहा और उसके बाद स्नान करके उनके पास लौटने को कहा। सूरदास दो बार असफल हुए, जब उन्होंने गुरु से मिलने के लिए जाते वक़्त दो बार उनके कपड़े गंदे करने के लिए सफाई कर्मचारी पर चिल्लाया। लेकिन तीसरी बार वो अपने क्रोध को शांत करने में सफल हुए, जब उन्होंने सफाई कर्मचारी पर बिल्कुल नहीं चिल्लाया, जब उस कर्मचारी ने अपना सारा कचरा सूरदास पर फेंक दिया। तब सूरदास ने क्रोध से खुद को मुक्त
किया, जिसने उन्हें आध्यात्मिकता के मार्ग पर रोक दिया।

4.स्वामी विवेकानंद


आध्यात्मिक रूप से इच्छुक नरेंद्रनाथ यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनके सांसारिक कर्तव्यों को छोड़ने और उनके आंतरिक आह्वान का पीछा करने से पहले, उनके परिवार को अच्छी तरह से खिलाया और पहनाया जाए। श्री रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें एक ऐसी स्थिति में डाल दिया जहाँ हर बार वे दिव्य माँ से केवल उच्च आध्यात्मिक ज्ञान के लिए ही पूछ सकते थे और कुछ भी नहीं। आखिरकार स्वामी विवेकानंद को एहसास हुआ कि यह उनकी योजना थी और उन्हें यकीन था कि उनके सांसारिक सुखों को छोड़ने के बाद भी उनके परिवार का पूरा ख्याल रखा जाएगा। उन्होंने
गुरु की मंतशा बिना बोले समझ ली। नरेंद्रनाथ ही आगे चलकर स्वामी विवेकानंद बने। वो 20 वीं शताब्दी के सबसे लोकप्रिय आध्यात्मिक गुरुओं में से एक थे।

5.छत्रपति शिवाजी महाराज


मराठों के युवा राजकुमार अपने गुरु समर्थ रामदास स्वामी के प्रति अत्यधिक समर्पित थे। अन्य शिष्यों को राजकुमार के प्रति गुरु के अत्यधिक प्रेम से ईर्ष्या थी और इसलिए गुरु ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला किया। उन्होंने शिवाजी से कहा कि वह अस्वस्थ हैं और केवल एक बाघिन का दूध पीने से ठीक हो सकते हैं। शिवाजी ने जंगल में घुसकर एक बाघिन को दो शावकों के साथ पाया। उन्होंने उससे प्रार्थना की कि वह उसे दूध दे दे। पराक्रमी प्राणी बाध्य हुआ और राजकुमार उसके दूध के साथ लौट आया, इस प्रकार गुरु ने अन्य शिष्यों को शिवाजी के क्षमताओं का आभास कराया और गुरुप्रेम का उदाहरण अपने बाकी शिष्यों के सामने पेश करते हुए उनको चुप करा दिया।

Conclusion

हालांकि हम इन लोगों की तरफ महान शिष्य कभी नहीं बन सकते और बनने की कोशिश भी नहीं कर सकते। लेकिन इनके कुछ गुणों को अपने अंदर जरूर विकसित कर सकते हैं, ताकि अपने जीवन को और उज्वल बना सके। ज्यादा कुछ नहीं तो इस गुरु पूर्णिमा पर क्यों न इन महान शिष्यों को थोड़ी देर के लिए याद करें और इनको सम्मानित करें, इनका लगन, धैर्य और ज्ञान के लिए। साथ ही अपने गुरु को भी उचित रूप से सम्मानित करके उनको उनके गुरु दक्षिणा का कुछ अंश प्रदान करें।

GR Newsdesk
GR Newsdesk
Globalreport.in is a dynamic and versatile team of writers, contributing to a common cause. Journalism at its best. We cover a number of topics.
RELATED ARTICLES

Leave a Reply

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: