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जन्माष्टमी पर जानिए श्री कृष्ण जी के अवतार से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी

भारत के 7 प्राचीन सबसे पवित्र नागरियो में से एक नगरी है मथुरा, मथुरा में भगवान श्री कृष्ण जी का भरपुर रोमांच मिलेगा। मथुरा नामक स्थान का महत्व उसी प्रकार है जिस प्रकार ईसाईयो के लिए बेथलहेम बौद्ध धर्म वालो के लिए लुंबिनी और मुस्लिमो के लिए मदीना। 

भविष्यवाणी के अनुसार भगवान विष्णु को देवकी जी के गर्भ से कृष्ण के रूप में जन्म लेना था तो उन्होंने अपने आठवें अवतार के रूप में कृष्ण बनकर देवकी माता के गर्भ से अवतार लिया। जब भगवान श्री कृष्ण जी के मामा कंस को पता चला कि उनकी बहन देवकी औरवासुदेव की जो संतान होगी वही उसकी मृत्यु का कारण होगा। यह जानते ही कंस ने देवकी और वसुदेव को जेल में बंद कर दिया उसके बाद उन दोनो के जीतने भी संतान होते कंस उन्हें मार देता था।

कृष्ण जन्म होने के साथ ही हुए चमत्कार

जब भगवान श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ तो जेल के सभी लोग गहरी नींद में सो गए जेल के दरवाजे अपने आप खुल गए। उस समय भारी बारिश हो रही थी और उस भारी तूफान में ही वासुदेव जी नन्हे श्री कृष्ण जी को एक टोकरी में रखकर टोकरी लेकर जेल से बाहर निकल आए। कुछ दूरी पर यमुना नदी थी उन्हें वह नदी पार करनी थी तभी चमत्कार हुआ और यमुना के जल भगवान श्री कृष्ण के चरण छूकर अपने आप कमने लगे यमुना का जल दो हिस्सो में बट गया और बीच में से रास्ता बन गया।

कृष्ण जी का लालन-पालन यशोदा ने किया

कहा जाता है कि वासुदेव श्री कृष्ण जी को जमुना के उस पार गोकुल में अपने मित्र नंद गोप के यहां ले गए थे। वहां पर नंद की पत्नी यशोदा को भी एक कन्या हुई थी वासुदेव श्री कृष्ण ने यशोदा के पास कृष्ण जी को सुलाकर कन्या को अपने पास ले आए। गोकुल में मां यशोदा का मायका था और नंद गांव में उनका ससुराल इस प्रकार श्री कृष्ण जी का लालन-पालन यशोदा मैया और नंद जी ने किया था।

जन्माष्टमी पर जानिए श्री कृष्ण जी के अवतार से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी

जमुना के तट पर बसा एक गांव है जिसका नाम है गोकुल वहां सभी नंद के गायो का निवास स्थान था। नंद मथुरा के आसपास गोकुल और नंद गांव में रहने वाले सभी के मुखिया हुआ करते थे। जब यह बात कंस को पता चली की छल पूर्वक वासुदेव और देवकी ने अपने पुत्र को कहीं और भेज दिया है तो उसने चारो दिशा में अपने अनुचरो को पता लगाने के लिए भेज दिया पहली बार में ही कंस के अनुचरो को यह पता चल गया कि हो ना हो बालक को यमुना के उस पार ही छोड़ा गया है। 

वृंदावन कृष्ण जी की लीलाओं का प्रमुख स्थान 

बाल्यकाल से ही श्रीकृष्ण ने अपने मामा के द्वारा भेजे गए अनेक राक्षसो को मार डाला था उसके सभी कुप्रयासो को श्री कृष्ण विफल कर देते थे। सबसे पहले उन्होंने पूतना को मारा उन्होंने उसे नंद बाबा के घर से कुछ दूरी पर ही मारा था। नंद गांव में कंस के अत्याचार बढ़ते जाने के कारण नंद बाबा ने कृष्ण जी को भाई बलराम के साथ दूसरे गांव वृंदावन लेकर चले गए।

वृंदावन मथुरा से 14 किलोमीटर दूर है श्रीमद् भागवत और विष्णु पुराण के अनुसार कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी अपने जाति कुटुंबियो के साथ गांव से वृंदावन आकर बस गए। विष्णु पुराण में वृंदावन के कृष्ण की लीलाओ का वर्णन किया गया है जहां श्री कृष्ण ने कालिया का भी दमन किया था।

कालिया और धनुष का वध

भगवान श्री कृष्ण बाल रूप से जब थोड़े बड़े हुए तो उन्होंने कदम भवन में बलराम जी के साथ मिलकर कालिया नाग वध किया। इसी प्रकार वही दैत्य जाति का धनुष नामक का अत्याचारी व्यक्ति रहता था जिसका वध बलदेव ने किया इस घटना से कृष्ण जी और बलदेव की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।

श्री कृष्ण जी की रासलीला 

मान्यता के अनुसार वहीं पर भगवान श्री कृष्ण जी और राधा एक घाट पर युगल स्थान में स्नान करते थे। इससे पहले कृष्ण जी की राधा से मुलाकात गोकुल के पास संकेत तीर्थ पर हुई थी वृंदावन में ही भगवान श्री कृष्ण और गोपिया आंख मिचोली खेलते थे। यहीं पर श्री कृष्ण जी और उनके सभी शाखा और सखिया मिलकर रासलीला यानी तीज त्योहारो पर नीति उत्सव का आयोजन करते थे। श्री कृष्ण जी बहुत शरारती थे जिस कारण उन्हें बांके बिहारी भी कहा जाता था और वही पर आज बांके बिहारी जी का मंदिर भी है। यही नहीं यमुना का प्रत्येक घाट और वृंदावन कृष्ण की कथा जुड़ी हुई है।

श्री कृष्ण जी ने एक उंगली उठा लिया गोवर्धन पर्वत

वृंदावन के पास ही गोवर्धन पर्वत है जहां पर कृष्ण जी ने लोगो को इंद्र के प्रकोप से बचाया था उस काल में लोग इंद्र से डरकर उनकी पूजा करते थे। भगवान श्री कृष्ण जी उनके इस डर को बाहर निकालें और फिर से परमेश्वर के प्रति ही प्रार्थना करने की शिक्षा दी। यही नहीं इंद्र की पूजा का उत्सव बंद करके कार्तिक मास में अन्नकूट का उत्सव आरंभ कराया। कंस का वध

जन्माष्टमी पर जानिए श्री कृष्ण जी के अवतार से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी

वृन्दावन में कालिया और धनुक का सामना करने के कारण दोनो भाइयो की ख्याति हुई और इस कारण कंस यह बात भली-भांति समझ गया की ज्योतिष भविष्यवाणी के अनुसार इतना शक्तिशाली किशोर तो वासुदेव और देवकी के पुत्र ही हो सकते हैं। तब कंस ने दोनो भाइयो को पहलवानी के लिए निमंत्रण दिया जाता था कि उन्हें पहलवानों के हाथों मरवा दे। लेकिन दोनो भाईयो ने पहलवानो के शिरोमणि चाणूर और मुष्ठिक को मारकर कंस को पकड़ा दिया और तभी देखते देखते ही कंस को भी मार दिया।

कंस के वध के बाद उग्रसेन राजा हुआ

कंस का वध करने के पश्चात श्री कृष्ण और बलदेव ने कंस के पिता उग्रसेन को पुनः राजा बना दिया। उग्रसेन के 9 पुत्र थे उसमें सबसे बड़ा था कंस और उसके पांच बहने भी थी। कृष्ण जी बचपन में ही कई आकस्मिक दुर्घटनाओ का सामना करने और किशोरावस्था में कंस के संयंत्रो को विफल करने के कारण बहुत लोकप्रिय हो गए थे उसके बाद उनका अज्ञातवास वही समाप्त हो गया।

तब उनके पिता और पालको ने दोनो भाइयो के लिए शिक्षा-दीक्षा का इंतजाम हुआ। दोनो भाइयो को अस्त्र शस्त्र और शास्त्री की शिक्षा देने के लिए सांदीपनी के आश्रम भेजा गया था जहां कृष्ण और बलराम ने दीक्षा ली और अन्य शास्त्रों के साथ धनुर्विद्या में भी विशेष दक्षता प्राप्त की वहीं सुदामा ब्राह्मण के गुरु भाई हुआ।

इस आश्रम में कृष्ण जी ने अपने जीवन के कुछ साल बिताकर कई सारी घटना से सामना किया और यहां भी उनको प्रसिद्धि मिली। शिक्षा और दीक्षा हासिल करने के बाद भगवान कृष्ण और बलराम पुनः मथुरा लौट आए और फिर वह मथुरा के सेना और शासन का कार्य देखने लगे उग्रसेन जो मथुरा के राजा थे वे कृष्ण के नाना थे। 

जरासंध का आक्रमण

कंस के मर जाने के बाद उसका ससुर और मगध के सबसे शक्तिशाली सम्राट जरासंध भी क्रोधित हो रहा था। कंस की पत्नी मगध नरेश जरासंध को बार-बार इस बात के लिए उकसाती ही थी कि कंस से बदला लेना होगा। इसीलिए मथुरा कि राज्यों को हराने के लिए 17 बार आक्रमण भी किए गए लेकिन हर बर वह कृष्ण से हार जाते थे।

भगवान श्री कृष्ण और कलियवन का युद्ध 

भगवान श्री कृष्ण जी ने कलियवन से भी युद्ध किया लेकिन इसमें रोचक बात यह हैैै कि इस युद्ध से श्री कृष्ण रणभूमि छोड़कर भागने लगेे और उनके पीछे  कलियवन भी भागने लगेे। भागते भागते भगवान श्री कृष्ण गुफा में चले गए  और उनका पीछा करते हुए जब कलियवन गुफा में गया तब उसने एक दूसरे  व्यक्ति को सोते हुए देखा। 

श्री कृष्ण जी के अवतार से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी

कलियवन ने उसे कृष्ण समझकर जोर लात मार दी और वह मनुष्य उठ गया उसने जैसे ही आंखे खोली तब कलियवन उसके देखने मात्र से ही जलकर भस्म हो गया। दरअसल गुफा में जो सोया हुआ था वह इशवाकू वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचूकुंद था जो बहुत तपस्वी और प्रतापी भी था। मुचकुंद को वरदान था कि जो भी उसे उठाएगा वह उसे देखते ही भस्म हो जाएगा।

महाभिनिष्क्रमण

कालियवन के मर जाने के बाद हड़कंप मच गया अब विदेशी भी श्री कृष्ण के शत्रु हो चले थे। कृष्ण जी ने अपने जातियों को मथुरा छोड़ देने पर राजी कर लिया और वे सब मथुरा छोड़कर रैवत पर्वत के समीप  कुशस्थली (द्वारिका) पूरी में जाकर बस गए।

श्री कृष्ण और अर्जुन की पहली मुलाकात

जब पांचाल के राजा द्रुपद द्वारा द्रोपती स्वयंबर का आयोजन किया गया उस समय पांडव के बनवास का में से अज्ञातवास का 1 साल भी चुका था। कृष्ण जी भी उस स्वयंवर में गए थे वहां उनकी बुआ कुंती के लड़के पांडव भी मौजूद थे और यहीं से पांडवो के साथ कृष्ण की घनिष्ठता आरंभ हुई। पांडवो ने द्रौपदी को प्राप्त कर लिया और इस प्रकार अपने धनुर्विद्या का कौशल देश के राजाओ के समक्ष प्रकट किया। श्रीकृष्ण ने वहीं पांडवो से अपनी मित्रता बढ़ाई और बनवास समाप्त होने के बाद पांडवो के साथ हस्तिनापुर पहुंचे।

भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन की मित्रता

कुरुराज धृतराष्ट्र ने पांडवो को इंद्रप्रस्थ के आसपास के प्रदेश दिया था। पांडवो ने कृष्ण के द्वार का निर्माण संबंधी अनुभव का लाभ उठाया और उनकी मदद से उन्हें जंगल के एक भाग को साफ करवा कर अच्छे और सुंदर रूप से इंद्रप्रस्थ नगर बसा दिया जिसके बाद कृष्ण जी फिर से द्वारका लौट गए। फिर 1 दिन अर्जुन तीर्थाटन के दौरान द्वारिका पहुंचे जहां श्री कृष्ण जी की बहन सुभद्रा को देखकर वे मोहित हो गए तब कृष्ण जी ने उन दोनो का विवाह करा दिया और इस प्रकार कृष्ण और अर्जुन के बीच की मित्रता प्रगाढ़ हो गई।

जरासंध का वध 

इंद्रप्रस्त के निर्माण के बाद युधिष्ठिर ने राज सुय यज्ञ का आयोजन किया और आवश्यक परामर्श के लिए श्री कृष्ण जी को बुलाया। फिर कृष्ण जी इंद्रप्रस्थ आए और उन्होंने राज सुय यज्ञ के आयोजन का समर्थन किया। लेकिन उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि पहले अत्याचारी राजा और उनकी सत्ता को नष्ट किए जाने चाहिए, तभी राज सुय यज्ञ का महत्व रहेगा और देश वदेश में प्रसिद्धि मिलेगी। युधिष्ठिर ने कृष्ण के इस सुझाव को स्वीकार कर लिया और तब कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को सबसे पहले जरासंध पर चढ़ाई करने की सलाह दी।

इसके बाद भीम और अर्जुन के साथ श्री कृष्ण जी मगध रवाना हुए और कुछ समय बाद मगध की राजधानी गिरीब्रज पहुंच गए। कृष्ण जी के नीति सफल हुई और उन्होंने भीम द्वारा मल्लयुद्ध में जरासंध का वध करवा दिया। जरासंध के वध के बाद कृष्ण जी ने जरासंध के पुत्र सहदेव को मगध का राजा बनाया। फिर उन्होंने गिरी ब्रज के बंदी गृह में बंधे सभी राजाओ को भी मुक्त किया और इस तरह कृष्ण जी ने जरासंध से पूर्व शासको का भी अंत करके बंदी हुए राजाओ को उनका राज्य वापस लौटा कर अपना कार्य सफल किया। जरासंध वध के बाद अन्य सभी क्रूर शासक भयभीत हो गए सभी को झूकने पर विवश कर दिया और इस प्रकार इंद्रप्रस्थ राज्य का विस्तार हुआ।

श्री कृष्ण जी के अवतार से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी

इसके बाद युधिष्ठिर ने राज सूय यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में युधिष्ठिर ने भगवान वेदव्यास जैसे सभी महान पुरषो को आमंत्रित किया। इसके अलावा सभी देशो के राजाधिराज को भी बुलाया गया। इस यज्ञ में कृष्ण जी के शत्रु और जरासंध का मित्र शिशुपाल भी उपस्थित हुआ था जो कृष्ण जी की पत्नी रुक्मणी के भाई का मित्र था और रुक्मणी से विवाह करना चाहता था। लेकिन यह कृष्ण जी की दूसरी बुआ का पुत्र था और इस नाते से वह कृष्ण जी का भाई था। 

कृष्ण जी ने अपनी बुआ को वचन दिया था कि उसके 10 अपराधो को क्षमा करेंगे। इस यज्ञ में शिशुपाल ने श्री कृष्ण जी का 100 बार से भी ज्यादा अपमान किया और वचन के अनुसार श्री कृष्ण जी ने शिशुपाल के सौ अपना अपमानो को माफ करके भरी सभा में ही उसका वध कर दिया।

महाभारत

द्वारिका में जाकर भगवान श्री कृष्ण जी ने धर्म राजनीति नीति आदि के कई पाठ पढ़ाए और धर्म कर्म का प्रचार किया। लेकिन वह कौरव और पांडव के बीच युद्ध को नहीं रोक पाए और महाभारत में अर्जुन के सारथी बने। उनके जीवन की यह सबसे बड़ी घटना थी कृष्ण के महाभारत में भी बहुत बड़ी भूमिका थी। श्री कृष्ण जी ने ही युद्ध से पहले अर्जुन को गीता के उपदेश दिया था।

महाभारत युद्ध में पांडवो के पक्ष की जीत कराने के लिए कृष्‍ण को युद्ध से पहले कई प्रकार के छल, बल और नीति का प्रयोग करना पड़ता था और उन्ही नीतियो के कारण पांडवों ने युद्ध जीत भी लिया। इस युद्ध में भारी संख्या में लोग मारे गए थे सभी कौरवो की लाश पर विलाप करते हुए गांधारी ने शाप दिया कि- ‘हे कृष्‍ण, तुम्हारे कुल का नाश हो जाए।

श्री कृष्ण जी 36 वर्ष तक द्वारिका में थे 

भगवान श्री कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था और उनका बचपन गोकुल, वृंदावन, नंदगाव, बरसाना आदि जगहो पर बीता। अपने मामा कंस का वध करने के बाद उन्होंने अपने माता-पिता को कंस के कारागार से मुक्त कराया और फिर जनता के अनुरोध पर मथुरा का राजभार संभाला। कंस के मर जाने के बाद कंस का ससुर जरासंध श्री कृष्ण का कट्टर शत्रु बन बैठा। जरासंध के कारण कालयवन भी मर गया उसके बाद श्री कृष्ण जी ने द्वारिका में अपना निवास स्थान बना लिया और वहीं रहकर उन्होंने महाभारत युद्ध में भी भाग लिया। महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण ने 36 वर्ष तक द्वारिका में राज्य किया था।

गांधारी का श्राप 

धर्म के विरुद्ध में आचरण करने के दुष्परिणाम स्वरूप दुर्योधन आदि मारे गए और कौरव वंश पूर्ण रूप से विनाश हो गया। महाभारत के इस युद्ध के बाद सांत्वना देने के उद्देश्य से भगवान श्री कृष्ण जी जब गांधारी के पास गए उस समय गांधारी अपने 100 पुत्रो की मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल हो रही थी। 

श्री कृष्ण जी के अवतार से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी

व्यथित अवस्था में अपने आंखो के सामने भगवान श्री कृष्ण को देखते ही गांधारी पूर्ण रूप से क्रोध में आकर उन्हें शाप दे देती है कि तुम्हारे कारण जिस प्रकार मेरे 100 पुत्रो का नाश हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे वंश का भी आपस में एक-दूसरे को मारने के कारण नाश हो जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण ने माता गांधारी के उस शाप को पूर्ण करने के लिए अपने कुल के यादवो की मति ही फेर दी।

दुर्वासा ऋषि का श्राप 

यदुवंशी को केवल गांधारी से ही नही बल्कि दुर्वासा ऋषि का भी श्राप मिला था। क्योंकि एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालको ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया ऐसे में गांधारी के बाद इस पर दुर्वासा ऋषि ने भी शाप दे दिया कि तुम्हारे वंश का नाश हो जाए।

उनके शाप के प्रभाव से कृष्ण के सभी यदुवंशी भयभीत हो गए। इस भय के कारण ही एक दिन कृष्ण की आज्ञा से वे सभी एक यदु पर्व पर सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र में आ गए। पर्व के आनन्द में आकर उन्होंने अति नशीली मदिरा पान कर ली और मतवाले होकर एक-दूसरे को ही मारने लगे। और इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर कुछ ही जीवित बचे रह गए।

कृष्ण का निर्वाण 

भगवान श्री कृष्ण इसी प्रभाव क्षेत्र में अपने कुल का नाश देखकर बहुत व्यथित हुए और वे वहीं रहने लगे। वहीं कभी कभार उनसे मिलने युधिष्ठिर भी आया करते थे। एक दिन वे इसी प्रभाव क्षेत्र के वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे योगनिद्रा में लेटे थे, तभी ‘जरा’ नामक एक बहेलिए ने भूलवश उन्हें हिरण समझते हुए उनपर विषयुक्त बाण चला दिया।

वह बाण जाकर श्री कृष्ण जी के पैर के तलवे में लग गया और भगवान श्रीकृष्ण ने इसी को बहाना बनाकर अपना देह त्याग दीए। महाभारत युद्ध के ठीक 36 वर्ष बाद उन्होंने अपनी देह इसी क्षेत्र में त्याग दी थी। जब महाभारत का युद्ध हुआ था, तब वे लगभग 56 वर्ष के थे। उनका जन्म 3112 ईसा पूर्व हुआ था और इस मान से 3020 ईसा पूर्व यानि उन्होंने 92 वर्ष की उम्र में देह त्याग की थी।

श्री कृष्ण जी के देह त्याग करने के बाद अंत में उनके प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओ की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओ को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया गया और वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को आज ब्रजमंडल कहा जाता है।

Jhuma Ray
नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।

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