Monday, May 16, 2022
Homeहिन्दीजानकारी"राष्ट्रीय वन शहीद दिवस" वनो के रक्षा करने वाले सुरक्षा बलो को...

“राष्ट्रीय वन शहीद दिवस” वनो के रक्षा करने वाले सुरक्षा बलो को दे श्रद्धांजलि।

वनो की रक्षा करने वाले रक्षा कर्मियो की ड्यूटी सुरक्षा को लेकर काफी जोखिम से भरी होती है। उनकी सजगता के कारण ही वनो और अन्य वन्यजीवो की सुरक्षा हो पाती है। हमेशा वन और वन्यजीवो के सुरक्षाकर्मी हमेशा अपनी ड्यूटी को लेकर पूरी तरह से मुस्तैद रहते हैं। जिससे वनो तथा वन्यजीवो की सुरक्षा सुनिश्चित होती है उनकी सुरक्षा में किसी प्रकार की कमिया सामने ना आए इसके लिए वह दिन रात प्रयास करते हैं।

और वन्यजीवो की सुरक्षा करने वाले ऐसे सुरक्षाकर्मियो और सुरक्षा देते हुए शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों को सम्मान देने के लिए हर साल 11 सितंबर को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस मनाया जाता है। दरअसल ये वह दिन होता है जब वन कर्मियो के बलिदान को याद किया जाता है।

राष्ट्रीय वन शहीद दिवस की घोषणा वन मंत्रालय ने साल 2013 में की थी। तभी से पूरे भारत में हर साल 11 सितंबर को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस मनाया जाता है। आइए जानते है इस दिवस की शुरुआत कैसे हुई इसका महत्व और उद्देश्य क्या है।

राष्ट्रीय वन शहीद दिवस का उद्देश्य

इस दिन देश के दूरदराज के क्षेत्रो और जंगलो में वन्यजीवो और वनो की रक्षा करने के लिए अपने प्राणो की आहुति देने वाले शहीदो को याद करने के उद्देश्य से इस दिवस को मनाया जाता है।

“राष्ट्रीय वन शहीद दिवस” वनो के रक्षा करने वाले सुरक्षा बलो को दे श्रद्धांजलि।

इस दिन उन्हें याद किया जाता है जो भारत की जंगलो और वन्यजीवो की सुरक्षा के लिए अपनी जान को जोखिम में डालते हैं। आए दिन नए खतरो का सामना करते हैं इस दिन सभी शहीदो को श्रद्धांजलि दी जाती है जिन्होंने वनो को सुरक्षा देते  वक्त अपनी जान जोखिम में डाल दी।

राष्ट्रीय वन शहीद दिवस की शुरुआत 

इस दिवस को मनाने की शुरुआत मनाने की घोषणा सबसे पहले वन मंत्रालय ने सबसे पहले साल 2013 में की थी। तभी से हर साल 11 सितंबर को सभी वन रक्षा कर्मियो को सम्मान देने के लिए राष्ट्रीय वन शहीद दिवस मनाया जाता है।

11 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय वन शहीद दिवस

राष्ट्रीय वन शहीद दिवस 11 सितंबर 1730 को हुए खेजरली नरसंहार को मनाने के लिए मनाया जाता है। दरअसल नरसंहार के दौरान राजस्थान के महाराजा अभय सिंह ने खेजरली के पेड़ो को काटना शुरू कर दिया था, और इस खेजरली के पेड़ो को गांव में बिश्नोई समुदाय केे लोगो द्वारा एक पवित्र पवित्र पेड़ माना जाता था।

जब महाराजा अभय सिंह पेड़ो को काट रहेें थे उस समय अमृता देवी नाम की एक महिला उनके प्रतिरोध में खड़ी हूई और खेजड़ली के पेड़ो के बजाय अपना सिर आगे कर दिया। तब अभय सिंह की सेना ने अमृता देवी के साथ उनकी तीन बेटियो का भी सिर काट दिया, जो अपनी माँ के साथ विरोध में खड़ी हो गईं थीं। इस नरसंहार की खबर राजा तक पहुंचने से पहले ही सेना द्वारा बिश्नोई समुदाय के 359 पुरुषो के सिर काट दिए गए।  

जब अभय सिंह ने यह भयानक खबर सुनी, तो उन्होंने तुरंत अपने आदमियो को पेड़ो की कटाई को रोकने का आदेश दिया और बिश्नोई समुदाय के इस अदम्य साहस का सम्मान किया।और इस समुदाय से माफी भी मांगी और बिश्नोई गांवो के भीतर और आसपास के खेजड़ली के पेड़ो को काटने और जानवरो के शिकार को हमेशा के लिए प्रतिबंधित करने के लिए एक तांबे की प्लेट पर उत्कीर्ण एक फरमान जारी किया।

Jhuma Ray
Jhuma Ray
नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।
RELATED ARTICLES

Leave a Reply

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: