“International Day of Innocent Children Victim of Aggression” के बारे में सभी महत्पूर्ण जानकारी।

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"International Day of Innocent Children Victim of Aggression" के बारे में सभी महत्पूर्ण जानकारी।

कभी जान कर तो कभी अनजाने में बच्चे हमेशा ही बचे अक्रामकता के शिकार होते हैं लेकिन फिर भी हम उस सबसे अनजान होते हैं। दिखने में छोटी लगने वाली बात भी बच्चो के लिए बड़ी परेशानी साबित होती है। बच्चो के साथ कई बार ऐसा होता है उनके साथ ऐसी घटनाएं होती रहती है जो शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से उन्हें पूरी तरह से प्रभावित करती है। 

क्यों मनाया जाता है यह दिवस 

दुनिया भर में हिंसा का शिकार हुए बच्चो को के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। चाहे वह हिंसा का व्यवहार उन्हें समाज में मिले, घर में मिले या विद्यालय में मिले लेकिन इससे बच्चे बुरी तरह से प्रभावित होते हैं। इस दिन को बच्चों के प्रति विश्व में होने वाले किसी भी प्रकार हिंसा के विरुद्ध जागरूकता के तौर पर मनाया जाता है। 19 अगस्त साल 1982 के यूएन जनरल असेंबली ने इस दिवस को वैश्विक स्तर पर मनाए जाने की घोषणा की गई थी। 

ताकि इस दिन की आवाज हर नागरिक तक पहुंचाई जाए केवल हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि विश्व के हर देश में हर दिन बच्चे अग्रेसन का शिकार होते हैं। विश्वभर में होने वाले ऐसे हिंसात्मक व्यवहार का बच्चो पर इस कदर प्रभाव पड़ता है कि बच्चे पुरी तरह से विकसित ही नहीं हो पाते। इन्हीं सभी बातो को ध्यान में रखते हुए हर साल 4 जून को आक्रामकता के शिकार हुए विश्व के हर मासूम बच्चे के लिए अंतर्राष्ट्रीय तौर पर यह दिवस मनाया जाता है।  

इस दिवस को मनाने का उद्देश्य 

मानवाधिकार कानूनो को बढ़ावा देने और बाल अधिकार की जिम्मेदारियो को सुनिश्चित करने के लिए यह दिन मनाया जाता है। इस दिन बच्चो को बचाने के लिए जागरूकता फैलाने के लिए बचाने के क्षेत्र में जागरूकता फैलाने के लिए कई संगठन विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमो का आयोजन करते हैं। इस अवसर पर बच्चो के खिलाफ हिंसा की सच्चाई को उजागर भी किया जाता है। साल 1982 के 19 अगस्त के दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 जून का दिन “इंटरनेशनल डे ऑफ इनोसेंट चिल्ड्रन विक्टिम आफ एग्रेसन” मनाने की घोषणा की थी। शुरुआती समय में तो इस दिवस को युद्ध के हालात के शिकार हुए बच्चो के लिए मनाया जाता था लेकिन बाद में इसके उद्देश्यो को दुनिया भर में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से दुर्व्यवहार से पीड़ित बच्चो को सुरक्षा देने के लिए उन्हें हर प्रकार हिंसा से बचाने के लिए प्रयास के तौर पर अपनाया जाने लगा।  

इस दिवस को मनाने के पीछे का इतिहास 

संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह फैसला फिलिस्तीन के सवाल पर आपातकालीन सत्र के दौरान किया था साल 1982 के 19 अगस्त के दिन इसकी शुरुआत हुई थी। जब इजराइल की हिंसा में फिलीस्तीन और लेबनान के बच्चो को युद्ध की हिंसा का शिकार होना पड़ा था और फिलीस्तीन ने संयुक्त राष्ट्र से इस बारे में उसी प्रकार के कठोर कदम उठाने पर आग्रह किया। साल 1982 में 4 जून के दिन इसराइल ने लेबनान पर हमला करने की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद हुए हमलों में भारी संख्या में निर्दोष लेबनानी और फिलिस्तीनी मासूम बच्चे मारे गए कुछ घायल हुए और कुछ बच्चे घर से बेघर हो गए। युद्ध हो या किसी भी प्रकार का सशस्त्र संघर्ष इन सभी में सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चे पर ही पड़ता है। बच्चो का बुरा हाल हो जाता है वे सामान्य शिक्षा से तो वंचित होते ही हैं साथ ही कुपोषण के भी शिकार होते हैं। 

हाल ही के कुछ दशको में दुनिया भर के अलग-अलग जगहो पर जहां जहां आतंकी घटनाएं होती हैं, वहां सबसे बड़ा नुकसान बच्चो को ही होता है। वे मानसिक और शारीरिक हिंसा के भी शिकार हो जाते हैं जिनके बारे में हमें पता तक नहीं चल पाता। जहां भी किसी प्रकार के छोटे सशस्त्र संघर्ष शुरू होते हैं उसमें सबसे ज्यादा कमजोर कड़ी बच्चे ही होते हैं और वही सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्ध में बच्चो को भर्ती और उपयोग उनकी हत्या, हिंसा, यौन उत्पीड़न, अपहरण, अस्पतालो पर हमला, स्कूलो पर हमला और बच्चो को मानवीय अधिकारो से वंचित करने को 6 सबसे ज्यादा बाल अधिकार उल्लंघन माने गए हैं। कुछ सालो में बच्चो के खिलाफ अत्याचारो में भारी मात्रा में वृद्धि हुई है। 

ऐसे संघर्ष से प्रभावित देशो में करीब 25 करोड़ बच्चो को सुरक्षा की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार बच्चो को सुरक्षित रखने की बहुत ज्यादा जरूरत है हालांकि बच्चो की सुरक्षा के लिए कुछ प्रयास भी किए जा रहे हैं लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। इस मामले में और ज्यादा प्रयास किए जाने की बेहद जरूरत है इसके लिए हिंसक चरमपंथियो को निशाना बनाए जाने की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी और मानव अधिकार कानूनो को प्रोत्साहित करने के साथ इसे सुनिश्चित करने की भी आवश्यकता है। ताकि बच्चो के अधिकारो को उल्लंघन ना किया जाए। और अगर इनके अधिकारो का उल्लंघन होता है तो इनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए। साल 1982 में इस दिवस को मनाने की घोषणा होने के बाद साल 1997 में ग्रासा मैकल रिपोर्ट ने बच्चों पर पढ़ने वाले सशस्त्र संघर्षो के घातक प्रभाव ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया।

“International Day of Innocent Children Victim of Aggression” के बारे में सभी महत्पूर्ण जानकारी।

जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने प्रचलित 51/77 प्रस्ताव को भी स्वीकार किया, जो बच्चो के अधिकारो से संबंधित था संघर्ष के हालात में बच्चो को ही सुरक्षा बेहतर करने के लिहाजे से यह एक बड़ा कदम था। वैसे तो संयुक्त राष्ट्र जन्म के समय ही हो जाने वाली बच्चो की मृत्यु, बच्चो के कुपोषण आदि जैसे कई समस्याओ के लिए काम कर रहा है। लेकिन आक्रामकता का शिकार हुए मासूम बच्चो या बच्चो के प्रति हो रहे अत्याचारो का मुद्दा शायद राजनैतिक शोर में कुछ दबता हुआ नजर आ रहा है। बच्चो की ऐसी स्थिति सिर्फ युद्ध के हालातो में ही दिखाई देती है लेकिन जब भी इतिहास में मनुष्य पर किसी भी प्रकार संकट आया है तो सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चो पर ही पड़ा है। 

बच्चो को होने वाले अब्यूज के प्रकार   

बच्चो पर तीन प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं फिजिकल अब्यूज, मेंटल अब्यूज, इमोशनल अब्यूज . बच्चो को छोटी छोटी बातो पर डांट देना, उन पर हाथ उठाना, चिल्लाना, उन्हें कभी भी मोटिवेट ना करना, ये सभी फिजिकल अब्यूज होते हैं।  मेंटल अब्यूज  यानी कि मानसिक तौर पर बच्चो को प्रभावित करना कई बार बच्चो के स्कूल में अच्छा परफॉर्म ना कर पाने के कारण उन्हें हर छोटी छोटी बात पर डांटा जाता है पेरेंट्स से शिकायत की जाती है और उन्हें दूसरे बच्चो से अलग रखा जाता है।  इमोशनल अब्यूज यानि बच्चो को इमोशनली ब्लैकमेल करके उनके साथ गलत व्यवहार गलत काम करना। परिवार में अच्छे और बुरे का भेदभाव करना एक ही घर के भाई बहनो में भेदभाव करना। 
ऐसे समय में कुछ हिम्मत वाले बच्चे तो समझदारी से आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन कुछ बचे चुप हो जाते हैं और गलत रास्ता भी अपना लेते हैं। इस तरह से बच्चो को अब यूज करके प्रताड़ित किया जाता है। रिपोर्टर्स के अनुसार 5 से 14 साल तक के बच्चे इसका सबसे ज्यादा शिकार होते हैं 45000 बच्चो पर किए गए एक सर्वे के अनुसार ” ह्यूमन राइट्स वॉच” द्वारा एक सर्वे किया गया इस रिपोर्ट के अनुसार हर दूसरा बच्चा चाइल्ड अब्यूज का शिकार होता है। इस रिपोर्ट के अनुसार हर चौथा परिवार अपने बच्चो के साथ हुई इस हरकत को छुपाने की प्रयास करता है। 

बच्चे में अग्रेशन होने के लक्षण 

बच्चो के आसपास रहने वाले उनके माता-पिता, बड़े बुजुर्ग, भाई बहन या शिक्षक चाहे तो बच्चो के अग्रेशन होने के लक्षणो को देखकर उन्हें पहचान सकते है। लेकिन आजकल लोग अपनी बिजी लाइफ में इस कदर व्यस्त रहते हैं कि उन्हें बच्चो के लिए समय ही नहीं मिलता जिस कारण बच्चे और ज्यादा अग्रेशन में जूझ रहे होते हैं। अगर हर एक बच्चे के जीवन में कोई समझदार व्यक्ति रहे तो किसी भी बच्चे का जीवन खराब नहीं होगा। बच्चो में अग्रेशन के लक्षण देखे जाते हैं जैसे अगर आप दिन भर बच्चे को सुस्त और अकेले रहना देखते हैं, उनको किसी प्रकार काम में रुचि ना आए, दिनभर गुस्सइ में रहना, भूख ना लगना, हर एक बात की जिद करना, कहीं भी मन ना लगाना इत्यादि बच्चे के अग्रेशन होने के लक्षण है।

बच्चे को अग्रेशन से कैसे बचाए   

बच्चे को अग्रेशन से बचाने के लिए पेरेंट्स अपने स्तर पर बच्चे को समझने का प्रयास करें। बच्चों की एक्टिविटी पर नजर रखें कम्युनिकेशन गैप ना होने दें, बच्चे किन लोगो से बात करते हैं कैसे दोस्तो के बीच है इस पर ध्यान दें, आक्रामकता वाली चीजें ना दिखाएं, बच्चो को समय दें, शिक्षक बच्चो में भेदभाव ना करें।

बच्चो में हिंसा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बाते –

  • दुनिया भर में हिंसा 1 बिलियन से भी ज्यादा बच्चे को प्रभावित करती है। 
  • दुनिया के 50% बच्चे हर साल हिंसा अनुभव करते हैं।
  • 18 साल की आयु से पहले 10 में से 1 बच्चे का यौन शोषण किया जाता है।
  • हर 5 मिनट में दुनिया में कहीं ना कहीं एक बच्चे की हिंसा से मौत होती है। 
  • दुनिया भर में 246 मिलियन बच्चे हर साल स्कूल संबंधित हिंसा से प्रभावित होते हैं।
  • 10 में से 9 बच्चे ऐसे देशो में रहते हैं जहां शारीरिक दंड पूरी तरह से शारीरिक दंड प्रतिबंधित नहीं है। 732 मिलियन बच्चे को कानूनी संरक्षण के बिना ही छोड़ दिया जाता है।
  • हर तीन में से एक छात्र को उसके साथियो द्वारा धमकाया जाता है और 10 में से कम से कम एक बच्चा साइबरबुलिंग का शिकार होता है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र के जरिए 17 सतत विकास लक्ष्यो की ऐतिहासिक योजना की शुरुआत की है जिसका उद्देश्य यह रखा गया है कि साल 2030 तक अधिक संपन्न, अधिक समतावादी और अधिक संरक्षित विश्व की रचना करना है। नए एजेंडे में पहली बार बच्चो के खिलाफ हिंसा के सभी रूपो को समाप्त करने के लिए एक विशिष्ट लक्ष्य को शामिल किया गया है और बच्चो के उपेक्षा, शोषण, दुर्व्यवहार को समाप्त करने के लिए कई अन्य हिंसा संबंधी लक्ष्यो को मुख्य धारा में शामिल किया गया है।

हमारे देश भारत में भी पिछले कुछ सालो से बच्चो के प्रति होने वाले हिंसा को रोकने के लिए कानून में कई प्रकार बदलाव किए गए। “प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ओफ्फेंसेस एक्ट पोक्सो एक्ट – पोक्सो एक्ट” लागू किया गया है इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध में अलग-अलग सजा का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम साल 2020 जागरूकता और क्षमता निर्माण के तहत केंद्र और राज्य सरकारो को बच्चो के लिए आयु उप्युक्त शैक्षिक सामग्री और पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए कहा गया है। बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम में बच्चो के साथ होने वाले यौन हिंसा को भी परिभाषित किया गया है। ऐसे मामलो में बच्चो को हर स्तर पर कैसी जरूरी सहायता देनी है यह भी विस्तार से बताया गया है चाइल्ड पॉर्नोग्राफी से जुड़े प्रावधानो को भी कठोर किया गया है। 

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