Tuesday, May 17, 2022
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संत श्री रामानुजाचार्य के जयंती पर आइए जानते हैं रामानुजाचार्य के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी

हमारे देश भारतवर्ष की भूमि बहुत ही पवित्र है। यहां कई संत महात्माओ ने जन्म लिया है जो अपने अच्छे आचार विचारो और कर्मो के जरिए मनुष्य के जीवन को सफल बना रहे हैं। कई सालो तक लोगो को धर्म की राह से जोड़कर जीवन का मार्ग प्रशस्त करा रहे हैं इन्हीं महान संतो में से एक श्री रामानुजाचर्य जी है। हर साल भारतवर्ष में रामानुजाचार्य की जयंती मनाई जाती है यह जयंती दक्षिण भारतीय दार्शनिक रामानुजाचार्य के सम्मान में मनाई जाती है। संत रामानुजाचार्य भगवान विष्णु के एक महान भक्त थे उन्होंने भक्ति आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने भगवान विष्णु की भक्ति के प्रति सम्पूर्ण समाज को अग्रसर किया था। आज हम आपको रामानुजा चार्य के बारे में जानकारी देने वाले हैं इस साल 2021 में रामानुजाचार्य की जयंती वैशाख शुक्ल पक्ष 18 मई मंगलवार को मनाया गया। 

महान संत श्री रामानुजाचार्य का जन्म 

हिंदू मान्यताओ के अनुसार महान संत श्री रामानुजाचार्य का जन्म साल 1017 में श्रीपेरंपुदुर तमिल नाडु के एक ब्राम्हण परिवार में हुआ था। उनके कम उम्र में ही उनके पिता केशव भट्ट का निधन हो गया बचपन में ही उन्होंने यादव प्रकाश गुरु से वेदो की शिक्षा ली थी। केवल 16 वर्ष की आयु में ही श्री रामानुजाचार्य ने सभी वेदो और शास्त्रो का ज्ञान प्राप्त कर लिया था और 17 साल के आयु में उनका विवाह संपन्न हो गया। उन्होंने अपने गृहस्थ आश्रम त्याग करके श्रीरंगम के यदिराज सन्यासी से सन्यास की दीक्षा ली थी।रामानुजाचार्य के जन्म के लिए कोई पर्याप्त साक्ष्य तो नहीं है लेकिन उनकी जयंती मनाने का कार्य तमिल कैलेंडर को देखकर किया जाता है। वैसे तो आमतौर पर रामानुजाचार्य जयंती चैत्र महीने में पढ़ती है जो तिरुवदिराई नक्षत्र पर होती है।  संत श्री रामानुजाचार्य के शिष्य संत कबीर और रविदास जैसे संत रहे हो तो वह कितने महान रहे होंगे।
वैष्णव के बहुत से संप्रदाय हैं जैसे कि बैरागी, राधाबल्लभ, दास, विष्णु स्वामी, गौड़ीय, सखी, श्री संप्रदाय, ब्रह्म संप्रदाय, हंस संप्रदाय, रुद्र संप्रदाय आदि। रामानुजाचार्य को सबसे ज्यादा ज्ञानी आचार्य के रूप में सम्मान दिया जाता है। उन्होंने वैष्णववाद के दर्शन और नैतिकता की वकालत करके समाज में शगुन भक्ति की स्थापना की थी। हमेशा उन्होंने अपने अनुयायियो का सलाहकारो को नियमो से अलग हटकर एक भक्ति मार्ग पर चलने को बढ़ावा दिया है। रामानुजाचार्य एक महान दार्शनिक व विचारक थे जैसा कि उनके दार्शनिक कार्यो यानी कि वेद, ग्रंथ, भागवत, काव्य और गीता के भाषणो में स्पष्ट होता है। हिंदू पुराणो के अनुसार श्री रामानुजाचार्य का जीवन काल 120 साल लंबा था। रामानुजाचार्य ने करीब 9 पुत्स्तके लिखी हैं और उन्हें नवरत्न कहा जाता है।

संत रामानुजाचार्य का परिचय

भक्ति धारा के महान संत रामानंद यानी रामानंदाचार्य ने हिंदू धर्म को संगठित और व्यवस्थित करने के लिए बहुत प्रयास किए हैं। उन्होंने ही वैष्णव संप्रदाय को पुनर्गठित किया और वैष्णव साधुओ को उनका आत्म सम्मान दिलाया। बादशाह गयासुद्दीन तुगलक ने हिंदू साधुओ और आम हिन्दू जाती के लोगो पर हर तरह से पाबंदी लगाई थी। हिंदू धर्म के लोगो पर बिना कारण कई प्रकार के नियम और पाबंद लगाए जाते थे बिना कारण उनपर कई बंधन थोपे जाते थे। और इन सब से हिंदुओ को छुटकारा दिलाने के लिए रामानंद ने बादशाह को योग बल के जरिए मजबूर कर दिया। यानी कि बादशाह ने हिंदुओ पर अत्याचार करना बंद करके उन्हें अपने धार्मिक उत्सवो को मनाने और हिंदू तरीके से रहने की छूट दे दी।

स्वामी रामानंदचार्य जी के कुल 12 शिष्य थे। उन्होंने अपने संवत 1532 यानी साल 1476 में आद्य जगदूरु रामानंदाचार्य जी ने अपना देश छोड़ दिया। उनके देह त्याग करने के बाद से वैष्णव पथियों में जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी के पद पर “रामानंदाचार्य की पदवी को आसीन किया जाने लगा। जैसे शंकराचार्य एक उपाधि है उसी प्रकार रामानंद जी को भी रामानंदाचार्य की गादी पर बैठने वाले को इसी उपाधि से विभूषित किया जाता है। दक्षिण भारत के लिए श्रीक्षेत्र नाणिज को वैष्णव पीठ के रूप में घोषित करके इसका नाम “जगदुरु रामानंदाचार्य पीठ,  नाणिजधाम रखा गया था। 

श्री रामानुजाचार्य ने वेदांत दर्शन पर आधारित अपना नया दर्शन विशिष्ट द्वैत वेदांत बनाया था। उन्होंने वेदांत के अलावा सातवींं और दसवीं शताब्दी के रहस्यवादी और भक्ति मार्ग के अलवार संतो से भी भक्ति के दर्शन और दक्षिण के पंचरात्र को अपने विचार का आधार बनाया था। 

रामानुजाचार्य के दर्शन में सत या परमसत के संबंध में तीन स्वर्ण तीन स्तर माने जाते हैं। वह है ब्रह्म यानी ईश्वर, चित्त यानी की आत्मा और अचित यानी प्रकृति और यह तीनो सत्य एक दूसरे से पृथक भी नहीं है बल्कि यह विशिष्ट रूप से ब्रह्म यानी ईश्वर का ही स्वरूप है। यानी कि ब्रह्मा ईश्वर पर ही आधारित है यही रामानुजाचार्य के विशिष्ट आवेश का सिद्धांत है। उदाहरण के तौर पर जिस प्रकार शरीर और आत्मा पृथक नहीं है यानी की आत्मा का उद्देश्य पूर्ति के लिए शरीर कार्य करता है उसी तरह ब्रह्म या ईश्वर से पृथक चित्त और अचित् तत्व का कोई अस्तित्व नहीं है। वह ब्रह्म या ईश्वर का शरीर है यानी कि ब्रह्म या ईश्वर उनकी आत्मा की तरह है।

मैसूर के श्रीरंगम से चलकर रामानुजाचार्य शालग्राम नामक स्थान पर रहने लगे थे। रामानुजाचार्य ने उस क्षेत्र में 12 सालो तक वैष्णव धर्म का प्रचार और प्रसार किया था और फिर उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए देश भर का भ्रमण किया। 

रामानुजाचार्य के मुताबिक भक्ति का मतलब पूजा, पाठ, कीर्तन भजन नहीं है बल्कि ईश्वर का प्रार्थना करना ईश्वर का ध्यान करना है क्योंकि आज के समय में भी रामानुजाचार्य की उपलब्धिया और उपदेश उपयोगी है। श्री रामानुजाचार्य बड़े विद्वान, महान चरित्र बल और उदार प्रवृति के साथ भक्ति में भी अद्वितीय थे। उन्हें योग सिद्धिया भी प्राप्त थी साल 1137 ई में रामानुजाचार्य ब्रह्मलीन हो गए थे।

बाद में रामानुजाचार्य आचार्य आलवन्दार यामुनाचार्य के प्रधान शिष्य बने। जब रामानुजाचार्य श्री यामुनाचार्य की शिष्य परंपरा में थे तब श्री यामुनाचार्य की मृत्यु सन्नकट थी फिर उन्होंने अपने शिष्य के माध्यम से श्री रामानुजाचार्य को अपने पास बुलाया। लेकिन इनके पहुंचने से पहले ही श्री यामुनाचार्य की मृत्यु हो गई वहां पहुंचने पर श्री रामानुजाचार्य ने देखा कि श्री यामुनाचार्य के तीन उंगलियां मुड़ी हुई थी यह देख रामानुजाचार्य समझ गए कि श्री रामानुजाचार्य इसके माध्यम से ब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्त्रनाम और अलवन्दारों के दिव्य प्रबंधन की टीका करवाना चाहते हैं। 

संत श्री रामानुजाचार्य के जयंती पर आइए जानते हैं रामानुजाचार्य के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी

इन्होंने श्री रामानुजाचार्य के मृत शरीर को प्रणाम किया और उनके इस अंतिम इच्छा को पूरा किया गुरु के चाहने अनुसार रामानुज ने उनसे तीन काम करने का संकल्प किया था पहला ब्रह्मसूत्र, दूसरा विष्णु सहस्रनाम और तीसरा दिव्य प्रबंधनम का टीका लिखना। रामानुजम ने करीब 9 पुस्तकें लिखी है जिन्हें नवरत्न कहा जाता है उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक श्रीभाष्य नाम की रचना है जो पूरी तरह से ब्रह्मसूत्र पर ही आधारित है। इसके अलावा बैकुंठ गद्यम, वेदांतसार, श्रीरंग गद्यम, वेदार्थ संग्रह, गीता भाष्य, वेदांत दीप आदि उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं।

वैष्णव के मुख्य संप्रदाय की बात करें तो रामानंद द्वारा रामानंद, रामानुजाचार्य द्वारा विशिष्टद्वेत, माधवाचार्य द्वारा माध्वचार्य, भास्कराचार्य द्वारा निम्बार्क, वल्लभाचार्य द्वारा पुष्टिमार्गी या शुद्धाद्वेत संप्रदाय का प्रचलन हुआ था। रामानुजाचार्य के प्रमुख शिष्यो में रामानंद जी का नाम अग्रिम रहा है जिनके आगे कबीर, रैदास, सूरदास जैसे शिष्य परंपरा देखने को मिलती है।

रामानुजाचार्य जी ने वेदो का चिंतन किया और उसके अनुरूप उपनिषदो तथा वेदांत सूत्रो के ब्रह्मा से एकात्मता को अपनी पद्धति का आधार बनाया। ईश्वर के रूप में ब्रह्मा में जीव पूरी संपूर्णता के साथ संबोधित होता है इन्हीं बातो पर रामानुजाचार्य जी ने अपना विचार विस्तार से रखा है। आचार्य रामानुजाचार्य के दर्शन का सिद्धांत बहुत से पुरानी मान्यताओ को दर्शाता है। यह सिद्धांत प्राचीन काल से ही चले आ रहे दर्शन के अलग-अलग मतो में से एक रहा है। रामानुजाचार्य द्वारा चलाया गया यह विचार प्रभावशाली विचारो में से एक था दक्षिण भारत में मुख्य रूप से चल रहे भक्ति आंदोलन से प्रभावित होते हुए यह आगे बढ़ता है।

रामानुजाचार्य ने ही इस विचार को प्रचलित किया था कि भक्त पूजा की कोई भी पद्धति का चुनाव कर सकते हैं और भक्ति के द्वारा भक्ति के उच्चतम स्तर तक पहुंच सकते हैं। क्योंकि श्री रामानुजाचार्य एक समर्पित भक्त थे आमतौर पर उनके सुझाए गए साधन मोक्ष प्राप्त करने के तरीके के रूप में स्वीकार किए जाते थे। वह एक प्रचारक के रूप में जाने जाते थे जिन्होंने भक्तो को निर्वाण का मार्ग निर्देशित किया और अपने भक्तो को निर्वाण प्राप्त करने में मदद की।

गुरु के इच्छा अनुसार रामानुजाचार्य ने तीन काम करने का संकल्प लिया था। पहला ब्रह्मसूत्र दूसरा विष्णु सहस्त्रनाम और तीसरा दिव्य प्रबंधन का टीका लिखना। 

उन्होंने वैकुंठ गद्दम, वेदार्थ संग्रह, श्रीरंग गद्यम, गीता भाष्य, वेदांत सार, वेदार्थ संग्रह, निथ्य ग्रंथम, वेदांत दीप आदि प्रसिद्ध रचनाएं की है। श्री रामानुजाचार्य ने वेदांत दर्शन पर आधारित अपना नया दर्शन विशिष्ट द्वैत वेदांत की रचना की है। उन्होंने वेदांत के अलावा सातवीं-दसवीं शताब्दी के रहस्यवादी और भक्ति मार्ग के अलवार संतो से भक्ति के दर्शन को और दक्षिण के पंचरात्र परंपरा को अपने विचार का आधार बनाया था। 

श्री रामानुजाचार्य बौद्ध विद्वान और उदार थे केवल यही नहीं वह भक्ति व चरित्र बल में भी अद्वितीय  महान व्यक्तित्व के संत थे। उन्हें योग सिद्धियां भी प्राप्त थी अपने काम की अनूठी प्रकृति के कारण ही उन्हें अभी भी केवल उनके अनुयायियो द्वारा ही नहीं बल्कि विचारको और दार्शनिको द्वारा भी उन्हें याद किया जाता है। 

हिंदू संस्कृति और धार्मिक परंपराओ में विद्वानो द्वारा उनकी गहरी समझ को आज भी उपयोग किया जाता है। उनके द्वारा चलाए गए संप्रदाय का नाम भी श्री संप्रदाय है इस संप्रदाय की आद्यप्रवर्तिका श्री महालक्ष्मी जी मानी जाती है। श्री रामानुजाचार्य ने पूरे देश में भ्रमण करके लाखो लोगो को भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया है यात्रा के दौरान अनेक जगहों पर आचार्य रामानुजाचार्य ने कई जीर्ण शीर्ण हो चुके पुराने मंदिरो का भी पुनर्निर्माण करवाया है। इन मंदिरों में प्रमुख तौर पर श्रीरंगम, तिरूनारायणपुरम और तिरुपति मंदिर प्रसिद्ध है। 

इनके सिद्धांतो के अनुसार भगवान विष्णु थिरुनारायणपुरम और तिरुपति मंदिर प्रसिद्ध इनके श्री रामानुजाचार्य के अनुसार भगवान विष्णु ही पुरुषोत्तम है वही हर एक शरीर में साक्षी रूप में विद्यमान है। भगवान नारायण ही सत हैं और उनकी शक्ति महालक्ष्मी है और यह पूरा संसार व जगत उनके आनंद का विलास है। भगवान श्री लक्ष्मी नारायण इस पूरे संसार के माता-पिता व इस संसार के सभी प्राणी उनकी संतान है। 

रामानुजाचार्य की जयंती पर भारत वर्ष के दक्षिण और उत्तरी हिस्सो में भक्त इस दिन विशेष तौर पर उत्सव का आयोजन करते हैं। इस शुभ अवसर पर श्री रामानुजाचार्य की मूर्ति को पारंपरिक तौर पर पवित्रता से स्नान कराया जाता है। साथ इस दिन रामानुजाचार्य की शिक्षाओ को ध्यान में रखकर खास प्रार्थनाएं और संगोष्ठीयो के सत्र आयोजित किए जाते हैं। 

श्री रामानुजाचार्य जयंती पर देश भर में इनकी पूजा होती है मंदिरो में सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस दिन उपनिषदो के अभिलेखो को सुनना बेहद शुभ माना गया है क्योंकि श्री रामानुजाचार्य इन उपनिषदो के निर्माण में गहराई से शामिल थे। भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में इस दिन खास तौर पर पूजा व अनुष्ठानो का आयोजन किया जाता है। इस दिन सभी भक्त इस विशेष अवसर को खास बनाने के लिए रामानुजाचार्य की मूर्तियो पर पुष्प अर्पित करके श्रद्धांजलि देते हैं। भगवान को दान पुण्य करते हैं भगवान विष्णु और रामानुजाचार्य से प्रार्थना करते हैं ताकि उनका जीवन भक्तिमयी और संपूर्ण सुख से बीते। 

Jhuma Ray
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नमस्कार! मेरा नाम Jhuma Ray है। Writting मेरी Hobby या शौक नही, बल्कि मेरा जुनून है । नए नए विषयों पर Research करना और बेहतर से बेहतर जानकारियां निकालकर, उन्हों शब्दों से सजाना मुझे पसंद है। कृपया, आप लोग मेरे Articles को पढ़े और कोई भी सवाल या सुझाव हो तो निसंकोच मुझसे संपर्क करें। मैं अपने Readers के साथ एक खास रिश्ता बनाना चाहती हूँ। आशा है, आप लोग इसमें मेरा पूरा साथ देंगे।
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